संयुक्त राष्ट्र में भारतीय संविधान के निर्माता बीआर अंबेडकर की जयंती पहली बार मनाई गई।
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क्या संविधान की पवित्रता की दुहाई देने वाले आंदोलनकारियों ने इसकी मूल भावनाओं को समझा है।या वे इतना ही समझते है जितना सेक्यूलर ब्रिगेड के नेताओं ने अपने चुनावी गणित के लिहाज से वोटरों में तब्दील हो चुके नागरिकों को बताया है। सच यही है कि आज भारत के लगभग 95 फीसदी लोग अपने संविधान की बुनियादी बातों से परिचित नही है।
क्या एक परिपक्व गणतंत्रीय व्यवस्था में उसके नागरिकों से संवैधानिक समझ की अपेक्षा नहीं की जाना चाहिए, जिस देश का संविधान लिखित रूप में दुनिया का सबसे विशाल और विस्तृत है क्या उसके 95 फीसदी शासित उसकी मूलभूत विशेषताओं और प्रावधानों से नावाकिफ रहते हुए आखिर कैसे संविधान की रक्षा की दुहाई दे सकते है?
हकीकत तो सिर्फ यही है कि हम भारत के लोग संविधान की इतनी ही समझ रखते की कुछ जन्मजात अधिकार संविधान से मिले हैं। जो घूमने, बोलने,खाने,इबादत करने,व्यापार करने,सरकार के विरुद्ध खड़े होने, सरकारी योजनाओं में हकदारी दावा करने की उन्मुक्तता देते है।
संविधान की इस एकपक्षीय समझ ने भारत में एक आत्मकेंद्रित फ़ौज पीढ़ी दर पीढ़ी खड़ा करने का काम किया है। इसी फ़ौज के बीसियों संस्करण आपको देश भर में अलग-अलग रूपों में मिल जाएंगे, जिनका एक ही एजेंडा है सरकारी खजाने का दोहन और संवैधानिक कर्त्तव्य के नाम पर उसकी तरफ से पीठ करके खड़ा हो जाना।
वस्तुतः भारत संविधानिक रूप से ही एक ऐसे नागरिक समाज की रचना पर खड़ा किया गया है जहां नागरिक जिम्मेदारी के तत्व को कभी प्राथमिकता पर रखा ही नहीं गया। 1950 में संविधान लागू हुआ और 1976 में 42 वे संशोधन से 10 कर्तव्य जोड़े गए। यानी 26 साल तक इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं गया कि लोकतंत्र जैसी सभ्य शासन प्रणाली आखिर कैसे बगैर जवाबदेही के चलाई जा सकती है?
सच्चाई यह है कि भारत के संविधान में आस्था रखने,समझने वाले लोग बहुत नहीं हैं। यहां हमारी चुनावी राजनीति ने लोगों को कभी नागरिक बनने का अवसर ही नही दिया। अपने फायदे के लिए वोटर समाज की रचना में जिस पराक्रम और निष्ठा के साथ सियासी लोगों ने काम किया है अगर इसी अनुपात में वे संवैधानिक साक्षरता के लिए काम करते तो भारत की तस्वीर अलग ही होती।
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