बाइडन ने अपनी विदेश नीति संबंधी टीम के लिए जो नियुक्तियां की हैं उससे ये संकेत मिल गया है कि अब अमेरिका की क्या प्राथमिकताएं रहेंगी
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भारत अमेरिका के लिए दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक रहा है। अगर 2019-20 के कारोबार आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत और अमेरिका के बीच 88.92 अरब डॉलर का द्विपक्षीय कारोबार हुआ और इस अवधि के दौरान भारत अमेरिका के लिए सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बनकर उभरा और भारतीय निर्यात में अमेरिका का 17 फीसदी योगदान रहा। यहां तक कि कोरोना काल के सबसे खतरनाक तीन महीनों (अप्रैल-सितंबर 2020) में भारत में एफडीआई के मामले में अमेरिका दूसरे नंबर पर रहा है। जाहिर है बाइडन के लिए ये तथ्य खासे महत्वपूर्ण हैं।
बाइडन ने अपनी विदेश नीति संबंधी टीम के लिए जो नियुक्तियां की हैं उससे ये संकेत मिल गया है कि अब अमेरिका की क्या प्राथमिकताएं रहेंगी। अमेरिका में हर सरकारी पद पर हुई नियुक्ति पर सीनेट की मुहर लगनी जरूरी होती है। इस प्रक्रिया से पहले नियुक्त अधिकारी से सीनेटर पूछताछ करते हैं।
- ट्रंप की किन नीतियों और फैसलों को जारी रख सकते हैं बाइडन
विदेश मंत्री के रूप में नियुक्त टोनी ब्लिंकेन के सीनेट में दिए गए भाषण के आधार पर विश्लेषकों का कहना है कि शुरुआती संकेत से ये तो जरूर पता चलता है कि बाइडन विदेश नीति में कुछ बदलाव करेंगे, लेकिन मोटे तौर पर वे डॉनल्ड ट्रंप के दौर में अपनाई गई नीति पर ही आगे बढ़ेंगे। खासकर चीन और चीन के शिनजियांग प्रांत में उइघुर मुसलमानों के कथित दमन के मामले में बाइडन प्रशासन मौजूदा सख्त नीति का पालन करता रहेगा।
टोनी ब्लिंकेन ने सीनेट में कहा कि बाइडन प्रशासन यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के ट्रंप प्रशासन के फैसले को जारी रखेगा। उसी तरह वह वेनेजुएला में दक्षिणपंथी नेता हुआन गुआइदो को वहां के अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में अमेरिकी मान्यता को भी जारी रखेगा। बाइडन प्रशासन उक्रेन को हथियार देने के फैसले को भी जारी रखेगा। साथ ही वह रूस और जर्मनी के बीच नॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन के लिए हुए करार का विरोध करता रहेगा।
ब्लिंकेन सीनेट में सुनवाई के दौरान ज्यादातर समय इसी बात पर जोर देते रहे कि बाइडन प्रशासन विदेश नीति में जल्दबाजी में कोई परिवर्तन नहीं करेगा। लेकिन कुछ मामलों में इसमें ठोस बदलाव लाए जाएंगे। मसलन, यमन में सऊदी अरब की बमबारी को अब अमेरिका समर्थन नहीं देगा। यमन के हाउथी बागियों को आतंकवादी समूह मानने के ट्रंप प्रशासन के फैसले की अब समीक्षा की जाएगी।
जाहिर है, एक बार फिर बराक ओबामा के वक्त का अमेरिका आकार लेने की कोशिश करेगा, लेकिन पिछले चार सालों में ट्रंप ने पूरी व्यवस्था को अपने तरीके से कुछ इस तरह चलाया है कि अंदरूनी तौर पर उसे ठीक करना और डेमोक्रेट्स की नीतियों को जल्दी लागू कर पाना बाइडन के लिए एक कड़ी चुनौती तो है ही।
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