फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गुलदार की आबादी बढ़ने से गुलजार हुए जंंगल, माना जाता है धरती का सबसे खतरनाक जीव

विज्ञापन
देश में गुलदारों की संख्या में चार सालों के अंदर 60 प्रतिशत वृद्धि से केंद्र एवं राज्य सरकारों के वन एवं पर्यावरण विभाग गदगद नजर आ रहे हैं - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

देश में गुलदारों की संख्या में चार सालों के अंदर 60 प्रतिशत वृद्धि से केंद्र एवं राज्य सरकारों के वन एवं पर्यावरण विभाग गदगद नजर आ रहे हैं। हों भी क्यों नहीं, क्योंकि बड़ी बिल्ली प्रजाति के बाघ या गुलदार जैसे मांसभक्षी एक स्वस्थ वन्यजीवन और अच्छे पर्यावरण के संकेतक होते हैं। लेकिन गुलदारों के कुनबे में यह उत्साहजनक वृद्धि देश के उन राज्यों में वनों के अंदर और आसपास रहने वाले 27 करोड़ लोगों के लिए खुशी का विषय नहीं बल्कि खतरे का संकेत है, क्योंकि इस धरती पर मानवजीवन के लिए सबसे खतरनाक जीव गुलदार ही माना जाता है।

विज्ञापन


अकेले उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में हर साल औसतन 32 लोग वन्यजीवों द्वारा मारे जाते हैं, जिनमें सर्वाधिक गुलदारों के शिकार होते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा की गई गणना के आधार पर जारी गुलदारों की नवीनतम संख्या भी केवल सांकेतिक ही मानी जा सकती है, क्योंकि संस्थान ने केवल बाघ संरक्षित क्षेत्रों में यह गणना की है। असली संख्या तो लाखों में होने का अनुमान है।

  • डेढ गुना बढ़ा गुलदारों का कुनबा

ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में गुलदार या तेंदुओं की संख्या 12,852 तक पहुंच गई है। जबकि इसके पहले 2014 में हुई गणना के अनुसार देश में 7,910 तेंदुए थे। इस अवधि में तेंदुओं की संख्या में 60 प्रतिशत बृद्धि हुई है। गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में 3,421 तेंदुए, कर्नाटक में 1,783 तेंदुए और महाराष्ट्र में 1,690 तेंदुए, दूसरे राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा पाए गए हैं। गणना में हिमालय के ऊंचाई क्षेत्र, शुष्क क्षेत्र से लेकर पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया है। जबकि तेंदुए शिकार से संरक्षित क्षेत्रों के साथ-साथ बहु उपयोग वाले जंगलों में भी पाए जाते हैं।

नवीनतम रिपोर्ट संपूर्ण तस्वीर नहीं है, क्योंकि यह सर्वे केवल बाघ आरक्षित क्षेत्रों में ही किया गया है। जबकि गुलदार बाघ खानदान का ऐसा सदस्य है जो कि संपूर्ण विश्व में पाए जाने के साथ ही भारत में हिमालय पर वृक्षरेखा से लेकर समुद्र तटीय क्षेत्रों तक और पश्चिम में गर्म रेगिस्तान को छोड़ कर सुदूर उत्तर पूर्व तक पाया जाता है।

विज्ञापन


इस रिपोर्ट में उत्तराखंड में ही मात्र 893 बताए गए हैं जबकि राज्य सरकार के वन विभाग के रिकार्ड में यह संख्या 2008 तक 2335 थी। राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री के कार्यालय के अनुसार राज्य में गुलदारों की संख्या लगभग 4 हजार पार कर चुकी है, जिनमें से 75 को मानवभक्षी घोषित किया जा चुका है। इस अनुपात में तो भारत में गुलदारों की वास्तविक संख्या लाखों में हो सकती है।

  • वनों की अच्छी सेहत का सूचक है गुलदार

गुलदार निश्चित रूप अन्य मांसहारी जीवों की तरह वन्यजीवन के संतुलन को बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। उसे वनों का रखवाला भी कह सकते है। जहां ज्यादा गुलदार या बाघ होंगे वहां निश्चित रूप से उनके निवाले वन्यजीव भी पर्याप्त संख्या में होंगे। वन्य जीवों की पर्याप्त संख्या सघन वनों का ही संकेतक है। लेकिन दूसरी ओर प्रकृति का यह वरदान देश की 27.5 करोड़ की उस आबादी के लिए यमदूत भी है जोकि वनों के अंदर और वनों के आसपास वनों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से निर्भर है।

  • धरती का सबसे खतरनाक जीव है गुलदार

भारत में हिंसक जीवों में भी गुलदार मनुष्य के लिए सबसे अधिक खतरनाक साबित हो रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और असम मानव-गुलदार संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं। जिस तरह गुलदार मनुष्य के लिए सबसे खूंखार जीव माना जाता है उसी तरह मानव भी गुलदार के लिए धरती पर सबसे खतरनाक जीव है। वह शिकार सहित ऊंचे-ऊचे पेड़ों पर चढ़ जाता है और पेड़ों के साथ ही आबादी के निकट झाडि़यों में छिपा रहता है। जबकि शेर या बाघ अपने भारी वजन के कारण ने तो पेड़ पर चढ़ सकते है और ना ही आसानी से स्वयं को छिपा सकते।

  • कार्बेट ने मारे 561 लोगों को खाने वाले दो गुलदार

मानव-गुलदार में अस्तित्व का यह संघर्ष नया नहीं है। भारत के लोग अभी भी शिकारी एवं वन्यजीव संरक्षक जिम कार्बेट को भूले नहीं होंगे। जिम कार्बेट ने ही दिसंबर 1910 में उत्तराखंड के चम्पावत जिले की पनार घाटी के नरभक्षी गुलदार को जिम कार्बेट ने मारा था। वह गुलदार कुमाऊं और सीमावर्ती नेपाल क्षेत्र में 436 लोगों की जानें ले चुका था। यह किसी भी नरभक्षी को सबसे बड़ा रिकाॅॅर्ड था।

हैजा से मरने वाले लोगों के जहां तहां लावारिस शवों का मांस खाने से मनुष्यों के मांस का स्वाद उसके मुंह लग गया था। जिम कार्बेट का अगला निशाना रुद्रप्रयाग का खूंखार गुलदार बना था जो कि 1918 से लेकर 1926 तक लगभग 125 लोगों को  मार चुका था। बीसवीं सदी में ब्रिटिश इंडिया के सेंट्रल प्रोविन्स का नरभक्षी भी एक अंग्रेज शिकारी का निशाना बना था जो कि लगभग 150 लोगों की जानें ले चुका था।

विज्ञापन

कंपनी सरकार के ही कार्यकाल में ब्रिटिश अफसरों द्वारा वन्य जीवों के शिकार के लिए गेम परंपरा भी शुरू की गई...

गुलदार - फोटो : सोशल मीडिया
  • बिहार और उत्तराखंड आतंक के साये में
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री के रिकॉर्ड के अनुसार भारतीय उप महाद्वीप में 1875 से लेकर 1912 तक 11,909 लोग गुलदारों के हमलों में मारे गए। भारत में भी गुलदारों के आतंक के मामले में बिहार का भागलपुर जिला पहले स्थान पर रहा जहां 1959 से लेकर 1962 तक गुलदारों द्वारा लगभग 350 लोग मारे गए। इस आतंक के मामले में उत्तराखंड दूसरे नंबर पर माना जा सकता है, जहां सन् 2000 से लेकर 2007 तक 239 लोग गुलदार के निवाले बने।

उत्तराखंड में भी पौड़ी जिला गुलदार हमलों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है, जहां 1988 से लेकर 2000 तक नरभक्षी गुलदारों द्वारा 140 लोग मारे गए। सन् 1918 से लेकर 1926 तक पूरे गढ़वाल डिविजन में 125 लोगों के मारे जाने का उल्लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है। जनसंख्या के विस्तार और पर्यावासों के निरन्तर संकुचन से दोनों के लिए रहने की जगह की कमी के कारण मानव और वन्यजीव संघर्ष उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ता जा रहा है।

उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण मंत्री डाॅ. हरकसिंह रावत के अनुसार प्रदेश में मानव एवं वन्यजीव संघर्ष में प्रदेश में औसतन 32 व्यक्ति प्रतिवर्ष वन्यजीवों द्वारा मारे जाते हैं और इनमें औसतन 22 शिकार गुलदार के होते हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के दीपान्जन नाहा, एस. सथ्यकुमार और जी.एस. रावत के एक शोध पत्र के अनुसार पौड़ी गढ़वाल में 2006 से लेकर 2016 तक गुलदारों के मनुष्यों पर 159 हमले हुए, जिनमें औसतन 3.5 व्यक्ति प्रति वर्ष इन हमलों में मारे गए और 11 घायल हुए।

सन् 1990 से लेकर 2005 तक पौड़ी जिले में 121 गुलदार वन विभाग द्वारा मानवभक्षी घोषित होने पर मारे गए। उत्तराखंड में पिछले वर्ष वन्यजीवों के हमलों में कुल 58 लोग मारे गए उनमें से सर्वाधिक 18 लोग गुलदारों द्वारा मारे गए। गुलदार का आतंक उत्तराखंड की राजधानी तक पहुंच चुका है। आदमी ही नहीं इस संघर्ष में बड़ी संख्या में हिंसक वन्यजीव भी मारे जा रहे हैं। पिछले वर्ष राज्य में 11 बाघ, 21 हाथी और 94 गुलदार की मौत हुई।
  • इनाम देकर मरवाए गए लाखों बाघ और गुलदार
लार्ड डलहौजी के ‘चार्टर ऑफ इंडियन फॉरेस्ट’ 1855 और तदोपरान्त सन् 1864 में इम्पीरियल फारेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना से पूर्व अंग्रेजी शासन की वन या वन्यजीव संरक्षण के प्रति कोई सुनियोजित नीति नहीं थी, इसलिए अपने व्यापारिक हितों की रक्षा तथा स्थानीय समुदाय को हिंसक वन्यजीवों से बचाने के नाम पर बड़े पैमाने पर बाघ एवं तेंदुओं का संहार कराया गया, जिसके लिए तत्कालीन शासन द्वारा परमिट के साथ ही पारितोषिक राशि दिए जाने का भी प्रावधान था। हालांकि पंद्रहवी शताब्दी में मालवा के शासक महमूद खिल्जी ने भी अपने राज्य से बाघ एवं गुलदार जैसे हिंसक वन्यजीवों का उन्मूलन करने का फरमान जारी कर दिया था।

कंपनी सरकार के ही कार्यकाल में ब्रिटिश अफसरों द्वारा वन्य जीवों के शिकार के लिए गेम परंपरा भी शुरू की गई। ‘द हिस्टोरिकल जर्नल (वॉल्यूम  58, मार्च 2015) में प्रकाशित विजय रामदास मंडल के शोधपत्र ‘‘द राज एण्ड द पैराडाॅक्स आफ वाइल्ड लाइफ कन्जर्वेशन’’ के अनुसार कंपनी सरकार ने बंगाल प्रेसिडेंसी में 1822 में 38,483 रुपये पारितोषिक में खर्च कर जनता को बचाने के लिए 5,653 बाघ मरवाए।

सन् 1875 में मेजर ट्वीडी ने अपने नोट में कहा था कि हर साल सरकार से इनाम पाने के लिए ब्रिटिश इंडिया में लगभग 20,000 बाघ और गुलदार जैसे हिंसक जीव मरवाए जाते हैं। एक अन्य शोधार्थी रंगराजन के अनुसार सन् 1875 से लेकर 1925 तक ब्रिटिश राज में जनजीवन को बचाने के लिए 80 हजार बाघ और 1.50 लाख गुलदार मारे गए।

इसी प्रकार बंगाल के मिदनापुर जिले में 1870 के दशक में गुलदारों और बाघों द्वारा 227 लोग मारे जाने पर 16 बाघ और 42 गुलदार मरवाए गए। सन् 1866 तक के 6 सालों में दक्षिण बंगाल में बाघों द्वारा 4,218 लोग तथा गुलदारों द्वारा 1407 लोग मारे जाने पर सरकार ने 65 हजार की राशि खर्च कर 18,196 बाघ और गुलदार जैसे खूंखार जीव मरवा दिए।

भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में जहां अधिकांश मानव आबादी बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। वन निवासियों का दीर्घकाल से वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व रहा है। इसलिए अनिवार्य है कि ऐसी कार्ययोजना को मूर्त रूप दिया जाए, जो स्थानीय लोगों की आर्थिक क्षति की पूर्ति कर सके और जन सहभागिता को बढ़ाए ताकि ऐसे भूदृश्य में एकीकृत संरक्षण एवं विकास लक्ष्यों को पूरा किया जा सके, जहां मानव और वन्यजीव साथ-साथ रह सकें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें