- बिहार और उत्तराखंड आतंक के साये में
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री के रिकॉर्ड के अनुसार भारतीय उप महाद्वीप में 1875 से लेकर 1912 तक 11,909 लोग गुलदारों के हमलों में मारे गए। भारत में भी गुलदारों के आतंक के मामले में बिहार का भागलपुर जिला पहले स्थान पर रहा जहां 1959 से लेकर 1962 तक गुलदारों द्वारा लगभग 350 लोग मारे गए। इस आतंक के मामले में उत्तराखंड दूसरे नंबर पर माना जा सकता है, जहां सन् 2000 से लेकर 2007 तक 239 लोग गुलदार के निवाले बने।
उत्तराखंड में भी पौड़ी जिला गुलदार हमलों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है, जहां 1988 से लेकर 2000 तक नरभक्षी गुलदारों द्वारा 140 लोग मारे गए। सन् 1918 से लेकर 1926 तक पूरे गढ़वाल डिविजन में 125 लोगों के मारे जाने का उल्लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है। जनसंख्या के विस्तार और पर्यावासों के निरन्तर संकुचन से दोनों के लिए रहने की जगह की कमी के कारण मानव और वन्यजीव संघर्ष उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ता जा रहा है।
उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण मंत्री डाॅ. हरकसिंह रावत के अनुसार प्रदेश में मानव एवं वन्यजीव संघर्ष में प्रदेश में औसतन 32 व्यक्ति प्रतिवर्ष वन्यजीवों द्वारा मारे जाते हैं और इनमें औसतन 22 शिकार गुलदार के होते हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के दीपान्जन नाहा, एस. सथ्यकुमार और जी.एस. रावत के एक शोध पत्र के अनुसार पौड़ी गढ़वाल में 2006 से लेकर 2016 तक गुलदारों के मनुष्यों पर 159 हमले हुए, जिनमें औसतन 3.5 व्यक्ति प्रति वर्ष इन हमलों में मारे गए और 11 घायल हुए।
सन् 1990 से लेकर 2005 तक पौड़ी जिले में 121 गुलदार वन विभाग द्वारा मानवभक्षी घोषित होने पर मारे गए। उत्तराखंड में पिछले वर्ष वन्यजीवों के हमलों में कुल 58 लोग मारे गए उनमें से सर्वाधिक 18 लोग गुलदारों द्वारा मारे गए। गुलदार का आतंक उत्तराखंड की राजधानी तक पहुंच चुका है। आदमी ही नहीं इस संघर्ष में बड़ी संख्या में हिंसक वन्यजीव भी मारे जा रहे हैं। पिछले वर्ष राज्य में 11 बाघ, 21 हाथी और 94 गुलदार की मौत हुई।
- इनाम देकर मरवाए गए लाखों बाघ और गुलदार
लार्ड डलहौजी के ‘चार्टर ऑफ इंडियन फॉरेस्ट’ 1855 और तदोपरान्त सन् 1864 में इम्पीरियल फारेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना से पूर्व अंग्रेजी शासन की वन या वन्यजीव संरक्षण के प्रति कोई सुनियोजित नीति नहीं थी, इसलिए अपने व्यापारिक हितों की रक्षा तथा स्थानीय समुदाय को हिंसक वन्यजीवों से बचाने के नाम पर बड़े पैमाने पर बाघ एवं तेंदुओं का संहार कराया गया, जिसके लिए तत्कालीन शासन द्वारा परमिट के साथ ही पारितोषिक राशि दिए जाने का भी प्रावधान था। हालांकि पंद्रहवी शताब्दी में मालवा के शासक महमूद खिल्जी ने भी अपने राज्य से बाघ एवं गुलदार जैसे हिंसक वन्यजीवों का उन्मूलन करने का फरमान जारी कर दिया था।
कंपनी सरकार के ही कार्यकाल में ब्रिटिश अफसरों द्वारा वन्य जीवों के शिकार के लिए गेम परंपरा भी शुरू की गई। ‘द हिस्टोरिकल जर्नल (वॉल्यूम 58, मार्च 2015) में प्रकाशित विजय रामदास मंडल के शोधपत्र ‘‘द राज एण्ड द पैराडाॅक्स आफ वाइल्ड लाइफ कन्जर्वेशन’’ के अनुसार कंपनी सरकार ने बंगाल प्रेसिडेंसी में 1822 में 38,483 रुपये पारितोषिक में खर्च कर जनता को बचाने के लिए 5,653 बाघ मरवाए।
सन् 1875 में मेजर ट्वीडी ने अपने नोट में कहा था कि हर साल सरकार से इनाम पाने के लिए ब्रिटिश इंडिया में लगभग 20,000 बाघ और गुलदार जैसे हिंसक जीव मरवाए जाते हैं। एक अन्य शोधार्थी रंगराजन के अनुसार सन् 1875 से लेकर 1925 तक ब्रिटिश राज में जनजीवन को बचाने के लिए 80 हजार बाघ और 1.50 लाख गुलदार मारे गए।
इसी प्रकार बंगाल के मिदनापुर जिले में 1870 के दशक में गुलदारों और बाघों द्वारा 227 लोग मारे जाने पर 16 बाघ और 42 गुलदार मरवाए गए। सन् 1866 तक के 6 सालों में दक्षिण बंगाल में बाघों द्वारा 4,218 लोग तथा गुलदारों द्वारा 1407 लोग मारे जाने पर सरकार ने 65 हजार की राशि खर्च कर 18,196 बाघ और गुलदार जैसे खूंखार जीव मरवा दिए।
भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में जहां अधिकांश मानव आबादी बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। वन निवासियों का दीर्घकाल से वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व रहा है। इसलिए अनिवार्य है कि ऐसी कार्ययोजना को मूर्त रूप दिया जाए, जो स्थानीय लोगों की आर्थिक क्षति की पूर्ति कर सके और जन सहभागिता को बढ़ाए ताकि ऐसे भूदृश्य में एकीकृत संरक्षण एवं विकास लक्ष्यों को पूरा किया जा सके, जहां मानव और वन्यजीव साथ-साथ रह सकें।
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