आवाज के जादूगर अमीन सयानी भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी आवाज सदियों तक हमारे कानों में गूंजती रहेगी। चर्चित शो 'बिनाका गीत माला' के जरिए वह घर-घर में पहचाने गए। उन दिनों जब उनकी आवाज 'जी हां बहनो और भाइयो, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी और आप सुन रहे हैं बिनाका गीतमाला' रेडियो पर सुनाई देती थी तो गली मोहल्ले में एकदम सन्नाटा छा जाता था।
न भूतो न भविष्यति, एक ऐसा कलाकार ना कभी हुआ है और ना कभी आगे होगा। जितने बड़े वह कलाकार थे उतने ही बड़े इंसान थे। उनके अंदर समझ बहुत कमाल की थी। अमीन सयानी अक्सर कहा करते थे कि उनकी जिंदगी में उनके बड़े भाई बड़े भाई हमीद का बहुत बड़ा हाथ है। वह हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे और कहते थे कि तुम बहुत अच्छा रेडियो कर सकते हो। जब उन्होंने रेडियो पर अपनी शुरुआत की तो हमेशा यही कहा करते थे कि ना तो मेरी हिंदी अच्छी है, ना उर्दू अच्छी है और ना ही अंग्रेजी अच्छी है, फिर भी लोग मुझे इतना प्यार करते हैं। यह सब तो लोगों का प्यार है।
मैं हमेशा कहता हूं कि दुनिया में जो बड़े काम होते हैं, वह अचानक ही होते हैं। उनको खुद भी नहीं पता था कि उनका 'शो बिनाका गीत माला' इतना बड़ा हिट हो जाएगा। उस जमाने का ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो उनसे मिलना नहीं चाह रहा था।
अमीन सयानी साहब से मेरी काफी बातचीत होती थी। अक्सर वह मेरी आवाज की तारीफ करते थे। मुझे एक बार 2003 में रेडियो में बेस्ट लेखन के लिए रापा अवार्ड मिला था और वह अवॉर्ड देने आए थे। उन्होंने स्टेज पर ही पूछा कि क्या आप जानते हैं अच्छा लेखक होने के लिए क्या जरूरी है? उन्होंने बताया कि किसी भी लेखन के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी है।
पहली चीज है लिखना, दूसरा जरूरी है उसे फिर से लिखना और तीसरा सबसे जरूरी है कि उसे एक बार और लिखना। अगर आप को कोई कला सीखनी है तो उसकी पुनरावृत्ति करनी पड़ेगी। तभी आप उस कला में महारत हासिल कर सकते हैं।
यह बात साल 2000 की है। जब मैं मुंबई में नया नया आया था और लोगों से मिलने स्टूडियो में जाया करता था। किसी ने मुझे सलाह दी कि तुम्हारी आवाज अच्छी है अमीन सयानी साहब से मिलो, वहां काम मिल सकता है। उस समय मैं मीरा रोड में रहता था। मैं टाउन में उनके स्टूडियो गया तो किसी ने उनसे मिलने नहीं दिया। मैं लगातार तीन दिन तक गया।
एक दिन उन्होंने बुलाकर पूछ लिया कि यहां आप काम कर रहे हैं कि करना चाहते हैं? मैने पैर छूकर प्रणाम किया और कहा कि मैं तो काम करना चाहता हूं। लोगों ने कहा कि आपका यहां काम चल रहा है, इसलिए मिलने आ गया। उन्होंने कहा कि अभी तो कुछ ऐसा है नहीं, रहेगा तो बताता हूं। इसके बाद मिलने जुलने का सिलसिला चलता रहा
जब मेरा शो 'पिक्चर पांडे' हिट हुआ तो बचपन की बात याद आ गई। उन दिनों हमारे घर में रेडियो होता नहीं था। रेडियो सुनने अपने दोस्त के यहां जाते थे। मेरे घर से दोस्त के घर की दूरी मुश्किल से 200 कदम रहा होगा। रेडियो पर जब 'जी हां बहनो और भाइयो, मैं हूं आपका दोस्त अमीन सयानी और आप सुन रहे हैं बिनाका गीतमाला' सुनाई देती थी तो कैसे सन्नाटा छा जाता था। जब मेरा शो 'पिक्चर पांडे' हिट हुआ तो बचपन की याद करके भावुक हो गया और मेरी आंखों में आंसू आ जाते थे।
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