14 अप्रैल को डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर का 129 वां जन्मदिन है। प्रत्येक वर्ष इस महापुरुष के जन्मदिन को पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार हम अपने घरों में रह कर बाबा साहेब को स्मरण करेंगे। आज वैश्विक आपदा की घड़ी है। कोरोना वायरस रूपी महामारी पूरे मानव समाज को निगलने के लिए तत्पर है, इस भयानक परिस्थिति में भी हमारे देश में तथाकथित कुछ लोगों का स्वर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खंडित कर रहा है। तब ऐसे में डॉ भीमराव अम्बेडकर जी की राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता के संदर्भ में दिए विचार को सबको स्मरण कराना अतिआवश्यक है।
कभी-कभी समाज की प्राचीनता के साथ उत्पन्न होने वाली रूढ़ियां, उस समाज की गति को अवरुद्ध कर देती है। ऐसे में लोक निराशा और हतोत्साह में अपना जीवन जीते रहते हैं और किसी की आंखों में कोई स्वप्न दिखलाई नहीं पड़ता है।
ऐसे समय में कोई व्यक्ति अपनी अकल्पनीय संघर्ष शक्ति से उस समाज को झकझोर कर उठाता है और आगे बढ़ने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। धीरे-धीरे समाज स्वयं अपने सामर्थ्य को पहचानता है और उस व्यक्ति के कृतित्व से प्रेरणा ग्रहण करता हुआ आगे बढ़ता चलता है। इसी व्यक्ति को महापुरुष कहा जाता है।
बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की सभी महत्वाकांक्षाओं को ठोकर मार कर अपने दुखी और पीड़ित जानो के जीवन में जागृत और प्रकाश लाने के साथ ही उनमें उत्साह एवं स्फूर्ति लाने के लक्ष्य को अपने जीवन का ध्येय बना लिया और इस चिरंजीवी राष्ट्र के नवनिर्माण को ही अपना साध्य समझा।
बाबा साहब की 129वी जयंती के अवसर पर राष्ट्र, राष्ट्रीयता एवं भारत राष्ट्र पर उनके विचारों को समझने की आवश्यकता है। महान राष्ट्रवादी बाबा साहब ने भारत राष्ट्र के प्रति जिस संवेदना के साथ अपने विचारों को सामने रखा, उसे समझना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है।
डॉ भीम राव आंबेडकर का जीवन राष्ट्र तथा दीन-हीनों की सवाल के लिए समर्पित था। एक और करोड़ों दुखी, पीड़ित लोगों के अधिकारों की रखा का प्रश्न, वही दूसरी और राष्ट्र हित का सतत स्मरण। हम जहां भी उनको देखते हैं, राष्ट्रीय हितों का संरक्षण-संवर्धन करता हुआ पाते हैं।
मुम्बई विधान परिषद् द्वारा साइमन कमीशन को दी गई रिपोर्ट पर डॉ आंबेडकर ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। 17 मई 1929 को उन्होंने अपनी एक स्वतन्त्र रिपोर्ट दी थी। उस रिपोर्ट का एक छोटा सा अंश उनकी अखंड-अक्षुण्ण राष्ट्रभक्ति का बोध कराता है।
रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि- 'मैं कर्नाटक को बम्बई से अलग करने के विरुद्ध हूंं क्योंकि एक भाषा एक प्रान्त का सिद्धांत अमल में लाने के योग्य नहीं है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि लोगों में संयुक्त राष्ट्रीयता का आभास उत्पन्न किया जाए। उनमें यह भावना नहीं है कि वे सर्वप्रथम भारतीय और बाद में हिन्दू, मुसलमान, सिंधी और कर्नाटकी हैं, बल्कि यह भावना कि वह प्रथमत: और अंतत: भारतीय हैं, उत्पन्न की जाए। यदि यह आदर्श हो तो फिर ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए, जिससे क्षेत्रीयतावाद और पृथक-पृथक समूह चेतनाओं का उदय हो।'
डॉ आंबेडकर के अनुसार राष्ट्र के निर्माण के लिए भूमि, वहां का समाज तथा समाज की श्रेष्ठ परम्परा, यह तीनों अनिवार्य अंग हैं। राष्ट्र केवल भौतिक ईकाई नहीं है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र एक जीवित आत्मा है।
यह एक आत्मिक सिद्धांत है। इसके लिए आवश्यक है कि स्मृतियों की बहुमूल्य विरासत का सामान्य अधिकार तथा वर्तमान काल में वास्तविक सहमति। एक साथ रहने की इच्छा तथा अविभाजित विरासत, जो हमारे पूर्वजों ने हमको सौंपी है, उसे कायम रखने की प्रबल इच्छा का होना नितांत आवश्यक है।
एक व्यक्ति की भांति राष्ट्र भूतकालीन लोगों द्वारा किए गए सतत् प्रयत्न, त्याग और देशभक्ति का परिणाम है। यहां पुरुषों की आराधना एक न्यायमुक्त बात है क्योंकि इन्ही पुरुषों ने हमें बनाया है। वीरतापूर्ण भूतकाल, श्रेष्ठ पूर्वज और उनकी महान यश गाथाएं हमारी सामाजिक पूंजी के ढांचे का निर्माण करती हैं, जिस पर हम अपने राष्ट्र की रचना कर सकते हैं।
एक राष्ट्र की रचना में भूतकालीन यश, वर्तमानकालीन सम्मिलित इच्छा, भूतकाल में एक साथ महान कार्य करने के अवसर और भविष्य में भी पुन: महान कार्य करने की प्रबल आकांक्षा, पूर्णरूपेण गर्भित है। इसके लिए हमने जो त्याग और कठिनाइयां झेली हैं, उनके प्रति हमारा अटूट अनुराग और अपने उत्तराधिकारियों को उन्हें सौंप देने की प्रबल इच्छा ही एक राष्ट्र की रचना करती है।
राष्ट्र की परिभाषा करते हुए डॉ आंबेडकर उसके लिए अपरिहार्य तत्वों का उल्लेख करते हैं। राष्ट्र के सम्बन्ध में जो उन्होंने उद्धत किया है, उसे आदर्श कहा जा सकता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण में वहां के समाज का, राष्ट्र के सम्बन्ध में सुख-दु:ख, यश-अपयश के प्रति विचार एक ही जैसा होना चाहिए।
राष्ट्र के भूतकाल और वर्तमान के प्रति देखने का दृष्टिकोण समान होना चाहिए। जिस समाज की राष्ट्र के प्रति ऐसी भावना होती है, वही समाज राष्ट्र का निर्माण करता है। बाबा साहब कहते हैं कि भूतकालीन यश, समान रूप से सुख-दु:ख और आशा में हिस्सा बंटाना आदि बातें एक राष्ट्र की द्योतक है।
एक साथ मिलकर कष्ट उठाना आनंद की स्मृतियों की तुलना में एकता के लिए अधिक महत्त्व का आधार है। राष्ट्रीय महत्त्व की स्मृतियों तथा ऐसी ही दुखद घटनाओं के उदाहरण विजय की तुलना में अधिक मूल्यवान है क्योंकि इससे कर्तव्य बोध जाग्रत होता है और सामूहिक प्रयत्नों की आवश्यकता अनुभव होती है।