बैसाखी 2020, किसानों के चेहरे मुरझाए हुए हैं।
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फरवरी मार्च ने भी कम नहीं रुलाया
लॉकडाउन की घोषणा मार्च अंत में हुई। पर किसानों के आंसू फरवरी में ही निकलने शुरू हो गए थे। सोशल मीडिया पर मिले उज्जैन के एक किसान का वीडियो हृदय विदारक था। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने उसकी मटर और गेंहू की पूरी फसल बर्बाद कर दी। वह रो रोकर यह दुहाई दे रहा था कि राजनीतिक लफड़ा और बीमारी के प्रकोप के साथ-साथ प्रकृति को भी उन पर तरस नहीं आया और उनके साथ खिलवाड़ कर गई। कई क्रांतियों के बाद आज भी भारतीय किसान बहुत हद तक प्रकृति पर ही निर्भर है।
यही वजह है कि उसकी ईश्वर पर सर्वाधिक आस्था होती है। अपने न्यूनतम साधनों में भी वह ईश्वर के प्रति अपना आभार व्यक्त करने में कसर नहीं छोड़ता। यही यह किसान भी कह रहा था कि वह हर रोज सुबह साढ़े छह बजे उठकर शिवजी भगवान को जल चढ़ाता है, हर धार्मिक कार्य के लिए यथासंभव चंदा देता है। फिर भी इंद्र देवता ने उसके साथ यह किया। वह भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि वे इंद्र देवता को ऐसा कठोर दंड दें कि वह उसे याद रखे। ये आंसू आज उज्जैन के ही नहीं ज्यादातर किसानों की आंखों में हैं।
उदास है बैसाखी
लॉकडाउन के चलते जो जहां है, वहीं थम गया है। आप अपने लिए महीने भर का राशन खरीद सकते थे, आपने खरीद लिया। पर फसल एडवांस में नहीं पक सकती, न एडवांस में काटी जा सकती है और न ही बेची जा सकती है।
फरवरी और मार्च की बेमौसम बारशि झेलने के बावजूद किसान ने अपना हौसला नहीं खोया था। पर लॉकडाउन ने उसकी कमर ही तोड़ दी। न मजदूर मिल रहे हैं, न फसल कट रही है। सीमित संसाधनों में जो लोग अपने परिवार और पड़ोसियों की मदद से फसल काट भी ले रहे हैं, उन्हें भी यह चिंता है कि मंडी में खरीदार नहीं। आड़तिये हर बार की तरह यहां भी चांदी काटे तो कोई हैरानी नहीं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने फसलों की खरीद की घोषणा की थी पर इस दिशा में भी खास नजर नहीं आ रहे। पंजाब सरकार ने 185 लाख टन की बंपर फसल की उम्मीद की है पर मजदूरों के बिना कटाई और लॉकडाउन में खरीद कैसे होगी, इस पर कोई ठोस नीति बन नहीं पाई है। बिहार से जो सूचनाएं सामने आ रहीं हैं, वहां 60 फीसदी लोग अपने खेतों में कटाई के काम में लग गए हैं। अब जरूरत है सरकार द्वारा इनकी खरीद की प्रक्रिया को तेज करने की।
जरूरी हैं ये प्रयास
फसल की कटाई के साथ-साथ उचित समर्थन मूल्य पर उसकी खरीद की भी जरूरत है। ताकि अन्नदाता को नुकसान न हो। मौसम का अब भी कोई ऐतबाबर नहीं है, और दुर्भाग्यवश अब भी भारत में किसानों के पास भंडारण के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि बेमौसम बारशि और ओलावृष्टि से जिन किसानों को नुकसान हुआ है, उनके नुकसान के आंकलन की प्रक्रिया को भी तीव्र करना होगा।
किसान फसल की बुवाई के लिए कर्ज उठाते हैं। पिछली कर्ज माफी के साथ ही अगली फसल की बुवाई के लिए कर्ज की प्रक्रिया को सरल और सुगम करना होगा। किसान मंडी में नहीं आ सकते, तो सरकार को यह व्यवस्था करनी होगी कि मंडी उन तक पहुंचे। तभी सच में हैप्पी हो पाएगी बैसाखी।
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