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आंबेडकर जयंती 2020: बाबा साहेब के विचार में राष्ट्र, राष्ट्रीयता और भारत राष्ट्र

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डॉ. आंबेडकर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
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14 अप्रैल को डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर का 129 वां जन्मदिन है। प्रत्येक वर्ष इस महापुरुष के जन्मदिन को पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार हम अपने घरों में रह कर बाबा साहेब को स्मरण करेंगे। आज वैश्विक आपदा की घड़ी है। कोरोना वायरस रूपी महामारी पूरे मानव समाज को निगलने के लिए तत्पर है, इस भयानक परिस्थिति में भी हमारे देश में तथाकथित कुछ लोगों का स्वर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खंडित कर रहा है। तब ऐसे में डॉ भीमराव अम्बेडकर जी की राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता के संदर्भ में दिए विचार को सबको स्मरण कराना अतिआवश्यक है।

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कभी-कभी समाज की प्राचीनता के साथ उत्पन्न होने वाली रूढ़ियां, उस समाज की गति को अवरुद्ध कर देती है। ऐसे में लोक निराशा और हतोत्साह में अपना जीवन जीते रहते हैं और किसी की आंखों में कोई स्वप्न दिखलाई नहीं पड़ता है।

ऐसे समय में कोई व्यक्ति अपनी अकल्पनीय संघर्ष शक्ति से उस समाज को झकझोर कर उठाता है और आगे बढ़ने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। धीरे-धीरे समाज स्वयं अपने सामर्थ्य को पहचानता है और उस व्यक्ति के कृतित्व से प्रेरणा ग्रहण करता हुआ आगे बढ़ता चलता है। इसी व्यक्ति को महापुरुष कहा जाता है।
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बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की सभी महत्वाकांक्षाओं को ठोकर मार कर अपने दुखी और पीड़ित जानो के जीवन में जागृत और प्रकाश लाने के साथ ही उनमें उत्साह एवं स्फूर्ति लाने के लक्ष्य को अपने जीवन का ध्येय बना लिया और इस चिरंजीवी राष्ट्र के नवनिर्माण को ही अपना साध्य समझा।

बाबा साहब की 129वी जयंती के अवसर पर राष्ट्र, राष्ट्रीयता एवं भारत राष्ट्र पर उनके विचारों को समझने की आवश्यकता है। महान राष्ट्रवादी बाबा साहब ने भारत राष्ट्र के प्रति जिस संवेदना के साथ अपने  विचारों को सामने रखा, उसे समझना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है।  

डॉ भीम राव आंबेडकर का जीवन राष्ट्र तथा दीन-हीनों की सवाल के लिए समर्पित था। एक और करोड़ों दुखी, पीड़ित लोगों के अधिकारों की रखा का प्रश्न, वही दूसरी और राष्ट्र हित का सतत स्मरण। हम जहां भी उनको देखते हैं, राष्ट्रीय हितों का संरक्षण-संवर्धन करता हुआ पाते हैं।

मुम्बई विधान परिषद् द्वारा साइमन कमीशन को दी गई  रिपोर्ट पर डॉ आंबेडकर ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। 17 मई 1929 को उन्होंने अपनी एक स्वतन्त्र रिपोर्ट दी थी। उस रिपोर्ट का एक छोटा सा अंश उनकी अखंड-अक्षुण्ण राष्ट्रभक्ति का बोध कराता है।

रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि- 'मैं कर्नाटक को बम्बई से अलग करने के विरुद्ध हूंं क्योंकि एक भाषा एक प्रान्त का सिद्धांत अमल में लाने के योग्य नहीं है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि लोगों में संयुक्त राष्ट्रीयता का आभास उत्पन्न किया जाए। उनमें यह भावना नहीं है कि वे सर्वप्रथम भारतीय और बाद में हिन्दू, मुसलमान, सिंधी और कर्नाटकी हैं, बल्कि यह भावना कि वह प्रथमत: और अंतत: भारतीय हैं, उत्पन्न की जाए। यदि यह आदर्श हो तो फिर ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए, जिससे क्षेत्रीयतावाद और पृथक-पृथक समूह चेतनाओं का उदय हो।'

डॉ आंबेडकर के अनुसार राष्ट्र के निर्माण के लिए भूमि, वहां का समाज तथा समाज की श्रेष्ठ परम्परा, यह तीनों अनिवार्य अंग हैं। राष्ट्र केवल भौतिक ईकाई नहीं है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र एक जीवित आत्मा है।

यह एक आत्मिक सिद्धांत है। इसके लिए आवश्यक है कि स्मृतियों की बहुमूल्य विरासत का सामान्य अधिकार तथा वर्तमान काल में वास्तविक सहमति। एक साथ रहने की इच्छा तथा अविभाजित विरासत, जो हमारे पूर्वजों ने हमको सौंपी है, उसे कायम रखने की प्रबल इच्छा का होना नितांत आवश्यक है।

एक व्यक्ति की भांति राष्ट्र भूतकालीन लोगों द्वारा किए गए सतत् प्रयत्न, त्याग और देशभक्ति का परिणाम है। यहां पुरुषों की आराधना एक न्यायमुक्त बात है क्योंकि इन्ही पुरुषों ने हमें बनाया है। वीरतापूर्ण भूतकाल, श्रेष्ठ पूर्वज और उनकी महान यश गाथाएं हमारी सामाजिक पूंजी के ढांचे का निर्माण करती हैं, जिस पर हम अपने राष्ट्र की रचना कर सकते हैं।

एक राष्ट्र की रचना में भूतकालीन यश, वर्तमानकालीन सम्मिलित इच्छा, भूतकाल में एक साथ महान कार्य करने के अवसर और भविष्य में भी पुन: महान कार्य करने की प्रबल आकांक्षा, पूर्णरूपेण गर्भित है। इसके लिए हमने जो त्याग और कठिनाइयां झेली हैं, उनके प्रति हमारा अटूट अनुराग और अपने उत्तराधिकारियों को उन्हें सौंप देने की प्रबल इच्छा ही एक राष्ट्र की रचना करती है।

राष्ट्र की परिभाषा करते हुए डॉ आंबेडकर उसके लिए अपरिहार्य तत्वों का उल्लेख करते हैं। राष्ट्र के सम्बन्ध में जो उन्होंने उद्धत किया है, उसे आदर्श कहा जा सकता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण में वहां के समाज का, राष्ट्र के सम्बन्ध में सुख-दु:ख, यश-अपयश के प्रति विचार एक ही जैसा होना चाहिए।

राष्ट्र के भूतकाल और वर्तमान के प्रति देखने का दृष्टिकोण समान होना चाहिए। जिस समाज की राष्ट्र के प्रति ऐसी भावना होती है, वही समाज राष्ट्र का निर्माण करता है। बाबा साहब कहते हैं कि भूतकालीन यश, समान रूप से सुख-दु:ख और आशा में हिस्सा बंटाना आदि बातें एक राष्ट्र की द्योतक है।

एक साथ मिलकर कष्ट उठाना आनंद की स्मृतियों की तुलना में एकता के लिए अधिक महत्त्व का आधार है। राष्ट्रीय महत्त्व की स्मृतियों तथा ऐसी ही दुखद घटनाओं के उदाहरण विजय की तुलना में अधिक मूल्यवान है क्योंकि इससे कर्तव्य बोध जाग्रत होता है और सामूहिक प्रयत्नों की आवश्यकता अनुभव होती है।

बाबा साहेब की आंखों में अखंड भारत की एक अलग परिभाषा थी। - फोटो : सोशल मीडिया
लाभ के लिए किए गए समझौते और राष्ट्र
मुस्लिम लीग द्वारा अपने लाभ के लिए किए जा रहे समझौतों को देखकर यह धारणा बनती है कि जब कुछ दल मिलकर अपने-अपने लाभ के लिए समझौते करते हैं तो राष्ट्र की अवधारणा विखंडित होती हुई दिखती है।

राष्ट्र, दलों के निहित समझौतों से ऊपर की सत्ता है। इस सम्बन्ध में डॉ आंबेडकर लिखते हैं कि संधिपरक दल इस बात में व्यस्त रहते हैं कि अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने के संघर्ष में दलों के मध्य शक्ति संतुलन बिगड़ने ने पाए। वह रेनन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि हितों का आकर्षण निश्चयात्मक रूप से एक शक्तिशाली बंधन है, जो मनुष्यों को आपस में बांधे रखते हैं। लेकिन फिर भी राष्ट्र के निर्माण के लिए यह पर्याप्त नहीं है।

मैं इसमें विश्वास नहीं करता। हितों के यसमुदाय द्वारा व्यावसायिक संधियां संपन्न होती है। राष्ट्रीयता में एक भावनात्मक पक्ष है, जप पूर्णतया यशरीर और आत्मा की तरह है।

राष्ट्र निर्माण के लिए भाषा एक कारण यतो हो सकती है, लेकिन यह मूलभूत आधार नहीं हो सकती। राष्ट्र का तो वहां के समाज की दृढ़ इच्छा शक्ति के आधार पर निर्माण होता है। वहां की जमीन, भाषा, वेशभूषा तथा व्यक्ति उस राष्ट्र को भौतिक स्वरूप प्रदान यकरते हैं, किन्तु राष्ट्र की आत्मा वहां के समाज की दृढ़ इच्छा शक्ति के अंदर होती है।

डॉ आंबेडकर कहते हैं कि भाषा एक-दूसरे से जोड़ने के निमंत्रण देती है लेकिन उसके लिए यदबाव नहीं डाल सकती है। अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेनिश-अमेरिका तथा स्पेन एक ही भाषा बोलते हैं, यतपरन्तु इससे एक राष्ट्र नहीं बनता। इसके विपरीत स्विट्जरलैंड के अंदर तीन-चार भाषाएं बोली जाती हैं फिर भी वह एकात्म हैं, संगठित हैं।

इसका अर्थ यही हुआ कि मनुष्य के अंदर उनकी भाषा के अतिरिक्त कोई भी महत्वपूर्ण तथ्य है, जो राष्ट्र को एक बनाए रखता है और वह है वहां के लोगों की इच्छा शक्ति। इसका अर्थ यही हुआ कि स्विट्जरलैंड को संठित बने रहने की इच्छा शक्ति उसकी भाषाओं की विविधता के बावजूद भी अधिक महत्वपूर्ण है। उपर्युक्त सभी आधारों पर भारत एक राष्ट्र है। यह एक राष्ट्र इसलिए है क्योंकि यहां के समाज में वह इच्छा शक्ति है, जिसके आधार पर कोई भी कीमत चुकारका भी वह एक राष्ट्र के रूप में अपने आपको बनाये रखना चाहता है।

डॉ आंबेडकर का विचार है कि राष्ट्र एक जीवमान संज्ञा है और सैकड़ों वर्ष के सतत परिश्रम से स्वयंभू प्रकट होता है। वह कहते हैं कि राष्ट्रीयता एक सामाजिक चेतना है। एकता के संयुक्त भावों का आभास ही राष्ट्रीयता है, जिससे व्यक्ति एक-दूसरे को अपना सगा-सम्बन्धी  समझने लगता है।

इस राष्ट्रीय भावना के दो आयाम है। एक ओर तो यह अपनों में एकता ओर अपनेपन का भाव लाती है, वहीं दूसरी ओर जो अपने सगे नहीं है, उनके प्रति विरोध भी प्रकट करती है। यह भावना आर्थिक एवं सामाजिक ऊंच-नीच की सभी खाइयों को समाप्त कर देती है। यही राष्ट्रीयता तथा राष्ट्रीय भावनाओं का निचोड़ है।

राष्ट्र की शक्ति तथा समृद्धि का आधार क्या है ? जब इसकी चर्चा चल रही है तो हम विचार करें कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति कहां रहती है? महान इतिहासकार लेकी के उदाहरण द्वारा वह अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न करते हुए डॉ आंबेडकर कहते हैं कि एक राष्ट्र की शक्ति ओर समृद्धि की नींव के आधार है-विशुद्ध घरेलू जीवन, व्यापार में ईमानदारी, नैतिकता तथा लोकहित के उच्च स्तर, सादा जीवन, साहस, सच्चाई तथा निर्णय में तर्क ओर उदारता का निश्चित पुट, जिसमें चरित्र तथा बौद्धिक प्रतिभा का समान योगदान हो।

यदि आप किसी राष्ट्र के भविष्य के लिए एक बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय करते हैं तो ध्यान से यह देखिए कि इन गुणों का उत्कर्ष हो रहा है या अपकर्ष। क्या चरित्र का महत्व बढ़ रहा है या घट रहा है ? जो लोग राष्ट्र में सर्वोच्च पद पर आसीन है, क्या वह उन लोगों में से हैं, जिनका नाम निजी जीवन में पार्टी का लिहाज किये बिना सक्षम, पारखी लोग सच्ची श्रद्धा के साथ लेते हैं? क्या वह सच्चे विश्वास वाले, सुसंगत छवि वाले तथा निर्विवाद सत्यनिष्ठा वाले व्यक्ति हैं ? केवल इस धारा को देखकर ही आप किसी राष्ट्र की जन्मपत्री तैयार कर सकते हैं।

प्रकृति और संस्कृति ने बनाया है भारत को एक राष्ट्र
डॉ आंबेडकर ने सम्पूर्ण भारत वर्ष को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया था। उनका मानना था कि इस राष्ट्र की निर्मिति कोई सौ-दो सौ वर्ष में नहीं हो गई है। इसको प्रकृति, समाज एवं उसकी संस्कृति ने एक राष्ट्र के अखंड स्वरूप के साथ निर्मित किया है। देश की एकता और अखंडता इस राष्ट्र की स्वाभाविक प्रकृति है।

इस देश की एकता का आधार प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक दोनों है। वह लिखते हैं कि इस मौलिक तथ्य को भूलना नहीं चाहिए कि प्रकृति ने भारत को एकत्रित भौगोलिक ईकाई के रूप में निर्मित किया है। इसकी एकता उतनी ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन प्रकृति है। इस भौगोलिक एकता के अंतर्गत अति प्राचीन समय से यह सांस्कृतिक एकता रही है।

इस सांस्कृतिक एकता ने राजनीतिक तथा जातीय विभाजन का सदैव विरोध किया है। किसी भी मूल्य पर यह कहा जा सकता है कि विगत 150 वर्षों से सभी सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैधानिक तथा प्रशासनिक संस्थाएं एक ही समान उदगम स्थल से कार्य कर रही हैं।

पाकिस्तान से सम्बंधित किसी भी विवाद पर विचार करते समय यह तथ्य आंखों से ओझल नहीं होना चाहिए कि किसी भी बात का प्रारंभिक बिंदु भले ही वह निर्णायक न भी हो, भारत की मौलिक एकता ही है। तब यह एकता छिन्न-भिन्न की जाए ? क्या केवल इसीलिए कि कुछ मुसलमान असंतुष्ट है ? इसके टुकड़े क्यों करते हो, जबकि ऐतिहासिक समय से यह एक समूर्ण ईकाई है।

भारत की एकता बहुत प्राचीन है। जानकारी के आभाव में आज कुछ लोग कहते हैं कि भारत वर्ष के अंदर जो एकता है, उसका श्रेय अंग्रेजों को है। वह यह नहीं जानते कि अंग्रेजों के इस देश में आने के सैकड़ों वर्ष पूर्व भी यह एक राष्ट्र था।

डॉ आंबेडकर उस स्थिति का वर्णन करते हैं कि यह देश हजारों वर्ष से अपनी सांस्कृतिक समरसता एवं विशिष्ठता के कारण ही संगठित है। यह संकलन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत गुंथा हुआ है। इसी आधार पर मेरा कहना है कि इस प्रायद्वीप को छोड़कर संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जिसमें इतनी सांस्कृतिक समरसता हो। हम केवल भौगोलिक दृष्टि से सुगठित नहीं है, बल्कि हमारी सुनिश्चित सांस्कृतिक एकता भी अविच्छिन्न और अटूट है जो पूरे देश में चारों दिशाओं में व्याप्त है।

वृहत्तर भारत : एक तथ्य
डॉ आंबेडकर ने यह प्रतिपादित किया है कि आज का वर्मा तथा अफगानिस्तान वृहत्तर भारत के भाग ही थे। इस सभी के अंदर एक मौलिक एकता भी थी। वह लिखते हैं कि भारत वर्ष की एकता एक ऐतिहासिक तथ्य है।

चन्द्रगुप्त के शासन के समय भी वह प्रदेश, जिनको आज पाकिस्तान के निर्माण के लिए मांगा जा रहा है, भारत के अंग थे। ईसा की सातवीं शताब्दी में जब ह्वेनसांग अपनी डायरी में लिखता है कि उस समय भारत को पांच भागों में विभाजित किया गया था, जिसमें उत्तरी भारत, दक्षिणी भारत, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत तथा मध्य भारत। इन पांच भागों में 80 रियासतें थी।

डॉ आंबेडकर कहते हैं कि भारत की सीमाएं अफगानिस्तान के प्रदेशों को अपने अंदर शामिल किए हुए थी तथा अफगानिस्तान भारत का ही एक अंग था। अफगानिस्तान के राजा हिन्दू क्षत्रिय थे। बाबा साहब ने लिखा है कि कश्मीर, पंजाब, पहाड़ी प्रदेश, उत्तरी अफगानिस्तान, जो कि सिंधु नदी के उस पार हैं, सतलुज के पार के प्रदेश भारत के अंदर शामिल थे और इस प्रकार उत्तरी भारत के अंदर काबुल, जलालाबाद, पेशावर, गजनी, बन्नू आदि सभी क्षेत्र हिन्दू क्षत्रिय राजा कपिशा के अधीन थे और उसकी राजधानी चरीकर थी, जो काबुल से मात्र 27 मील दूर थी।

इसके अतिरिक्त पंजाब के पहाड़ी इलाके तक्षशिला, सिंधपुर, उर्सा, पुंछ, राजौरी आदि भी उत्तरी भरता में सम्मिलित थे। यह सभी क्षेत्र राजा कश्मीर के नियंत्रण में थे। मुल्तान, शेरकोट को सम्मिलित करके समस्त मैदान, लाहौर के समीप स्थल तक, तकी या सांगला के राजा के आधीन था, ह्वेनसांग की यात्रा के समय यही भारत के सीमाएं थीं।
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आंबेडकर ने सामाजिक बुराइयों के प्रति समाज को जागरूक किया। - फोटो : सोशल मीडिया
अफगानिस्तान बौद्ध था या वैदिक
डॉ आंबेडकर लिखते हैं कि मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व तक अफगानिस्तान भारत का ही अंग था और वहां पर हिन्दू राजा राज्य करते थे। वह यह भी मानते हैं कि अफगानिस्तान की जनता या तो बौद्ध रही होगी या वैदिक धर्म को मानने वाली।

इन सारे विचारों का आधार वह ऐतिहासिक प्रमाण है, जो आज ह्वेनसांग आदि यात्रियों की डायरियों द्वारा उपलब्ध हो सका है। वह लिखते हैं कि यह सत्य है कि जब ह्वेनसांग भारत आया, तब न केवल पंजाब ही, बल्कि आज का सम्पूर्ण अफगानिस्तान भी भारत का ही एक भाग था।

पंजाब और अफगानिस्तान की जनता या तो वैदिक धर्म को मानने वाली थीं या बौद्ध थी। ह्वेनसांग के बाद भारत की कहानी बर्बर मुगलों, तुर्कों, पठानों द्वारा किये गए निरंतर आक्रमणों की दर्दनाक कहानी बनकर रह गयी। एक के बाद एक दूसरा मुसलमान अपनी सेना लेकर भारत पर आक्रमण करता रहा।

बर्मा (म्यान्मार) भारत का ही था अंग
डॉ आंबेडकर राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता के समर्थक थे। सांस्कृतिक एकता की तुलना में राजनीतिक या भौगोलिक एकता कम महत्व की बात है। प्रमुख महत्व की बात यह है कि उस क्षेत्र का दूसरे क्षेत्र से सांस्कृतिक लगाव कितना है ? बर्मा देश एक लम्बे समय तक इस देश के साथ वैचारिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से जुड़ा रहा है। वास्तव में बर्मा की एकता भारत के साथ बड़ी मौलिक है। इस विषय पर यह बतलाते हुए कि सांस्कृतिक रूप से तो बर्मा और भारत एक ही थे, परन्तु प्रशासनिक दृष्टि से भी बर्मा भारत के साथ जुड़ा हुआ था।

डॉ आंबेडकर लिखते हैं कि अराकान और तेन्नासारिम 1826 की येंदाबू की संधि के द्वारा भारत के साथ जोड़ दिए गए थे। पेगू तथा मर्तबान 1852 में जुड़े।

प्रशासनिक एकता भारत और बर्मा के मध्य 1826 में संपन्न हो गयी। यह एकता 110 वर्षों तक चली। 1937 में जब बर्मा को भारत से अलग किया गया, तब किसी ने आंसू नहीं बहाया। भारत और बर्मा की एकता भी कोई कम महत्व की नहीं थी। अगर एकता बनाये रखना है तो इसका आधार आपसी भाईचारा का भाव ही होना चाहिए। वास्तव में हिन्दुस्थान और पाकिस्तान की अपेक्षा हिन्दुस्थान और बर्मा में अधिक आध्यात्मिक एकता है।  

हिन्दुओं के लिए अखंड भारत है एक राष्ट्र
डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण देश के हिन्दू जनमानस की सोच को प्रकट करते हुए अपने विचार रखते हैं। वह लिखते हैं कि मुस्लिम पृथक राष्ट्र है। इस विचारधारा का हिन्दुओं ने घोर विरोध किया। एंग्लो इंडियंस के अनुसार भारत एक राष्ट्र नहीं है। परन्तु इसके विपरीत हिन्दू देशभक्त तथा राजनीतिज्ञ लगातार इस बात को दृढ़तापूर्वक कहते आये हैं कि भारत एक राष्ट्र है।

राष्ट्र और राष्ट्रीयता का विश्लेषण करते हुए डॉ आंबेडकर कहते हैं कि प्रथम तो भारत एक राष्ट्र नहीं है, यह सुनना हिन्दू के लिए शर्म की बात है क्योंकि राष्ट्र और राष्ट्रीयता विश्व में विशेष गुण माने जाते हैं और श्री एच जी वेल्स के शब्दों में बिना राष्ट्र और राष्ट्रीयता के वह देश उस व्यक्ति के सदृश है जो भीड़ में बिना वस्त्र के नंगा है।

दूसरा यह है कि स्वराज्य प्राप्ति का अधिकार राष्ट्र को ही है। इसलिए हिन्दुओं ने भारत को सदैव एक राष्ट्र की संज्ञा दी है। किसी भी भारतीय द्वारा हिन्दू की उपर्युक्त विचारधारा का विरोध नहीं किया गया। यह विषय इतना गंभीर था कि भारतीय इतिहास के महान नेताओं ने इसके पक्ष में एक बहुत बड़ा साहित्य प्रचारार्थ लिखा।

राष्ट्रीय निष्ठा सर्वोच्च स्थान पर
डॉ आंबेडकर का कहना था कि कोई भी व्यक्ति अपने संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र या जाति को देश के ऊपर रखेगा तो यह ठीक नहीं है। यह हमारे लिए शर्म की बात है। यह विकृत सोच का परिचायक है। इससे देश के अंदर सच्ची राष्ट्रीयता का विकास नहीं होगा। बाबा साहब का मानना था कि हमारी राष्ट्रीयता स्पष्ट और निर्विवाद होनी चाहिए। किस भी प्रकार की शर्त अथवा प्राथमिकताओं से घिरी-बंधी नहीं।

बाबा साहब ने इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कहा कि मैं जानता हूंं कि ऐसी कुछ बातें हैं, जो हमारी भारतीयता के प्रति एकनिष्ठा की प्राप्ति में बाधा बनती है। मैं यह बिल्कुल नहीं चाहूंंगा कि हमारी भारतीय निष्ठा को हमारे ही संप्रदाय, भाषा अथवा संस्कृति की निष्ठाएं प्रतिस्पर्धी भाव से लेशमात्र भी क्षति पहुंचाए।

मैं चाहता हूंं कि भारत के सभी लोग ऐसी सभी बातों से ऊपर उठाकर अपने आप को भारतीय और केवल भारतीय ही समझे। यदि किसी कारण से ऐसा नहीं हो पता है तो हम यह सबसे बड़ा पाप कर बैठेंगे और मैं हमेशा अपने सामर्थ्य के साथ इसका विरोध करता रहूँगा।

आज आपदा की इस घड़ी में शायद बाबा साहेब डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के कही बातें हमारा मार्ग को प्रशस्त कर सके, इसी अपेक्षा के साथ यह लेख प्रस्तुत है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि कोरोना महामारी जैसी चुनौतियों से लड़ने के लिए बाबा साहेब का आह्वान हमारे काम आयेगा। भारत जीतेगा और कोरोना हारेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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