अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू), जो कभी भारतीयों के लिए आधुनिक शिक्षा और योग्यता का प्रतीक थी, अब अपने अस्तित्व को तलाशती नजर आ रही है। सर सैयद अहमद ख़ान ने जिसे नैतिक नागरिकता का गढ़ बनाने की कल्पना की थी, वह अब अपनी उसी पहचान को तलाशती नज़र आ रही है।
| श्रेणी | कुल कर्मचारी | कम से कम 1 खून का रिश्तेदार नियुक्त | ≥2 रिश्तेदार | सबसे लंबी “परिवार शाखा” |
|---|---|---|---|---|
| गैर-शिक्षकीय कर्मचारी | 3,912 | 1,134 (29%) | 422 (11%) | 7 एक साथ तीन वेतनमानों में |
| संविदा कर्मचारी | 1,127 | 414 (37%) | 201 (18%) | 5 एक ही विभाग में |
| शिक्षकीय संकाय | 1,865 | 296 (16%) | 88 (5%) | 4 एक ही संकाय समूह में |
ये आंकड़े एक ऐसी संस्कृति को उजागर करते हैं जहां रिश्तेदारी योग्यता पर हावी है, जिससे दलित, ओबीसी-हिंदू, और पसमान्दा मुसलमान व्यवस्था से बाहर कर दिए जाते हैं।
शैक्षणिक पतन और छात्र मोहभंग
रिसर्च में गिरावट
जब पदोन्नति रिश्तेदारी पर आधारित हो, तो प्रतिष्ठित जर्नल में छपने की ज़रूरत घट जाती है। 2024 में एएमयू ने 2,100 स्कोपस-इंडेक्स्ड पेपर प्रकाशित किए, लेकिन उसका FWCI महज़ 0.64 था- जबकि IIT दिल्ली का 1.56 और जादवपुर यूनिवर्सिटी का 1.02 था।
पुराना पाठ्यक्रम, पुरानी सोच
वरिष्ठ संकाय, जो अपने संरक्षकों के प्रति वफादार हैं, वर्षों से सिलेबस नहीं बदलते। आठ विभाग आज भी 2015 से पहले के पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं।
छात्रों का मोहभंग
छात्र जानते हैं कि “चाचा” या “मौसी” कंट्रोलर ऑफिस में हो तो फैलोशिप पक्की है। मेरिट एक मिथक है। फिर भी छात्र हार नहीं मानते- झुग्गी बच्चों के लिए नाइट स्कूल चलाते हैं, क्राउडफंडेड जर्नल छापते हैं।
अलीगढ़ का शहरी ग़रीबी: एक छला गया मिशन
एएमयू का उद्देश्य अपने शहर को ऊपर उठाना था। इसके बजाय, पारिवारिक भर्ती ने स्थानीय प्रतिभाओं को बाहर कर दिया है। अलीगढ़ की साक्षरता दर 59% पर जमी हुई है- उत्तर प्रदेश के औसत से 12 अंक कम। विश्वविद्यालय का सामुदायिक विकास खंड सालाना ₹40 लाख से भी कम खर्च करता है- जो एक टेंडर घोटाले में निकलने वाली राशि के बराबर है।
भारत के मुस्लिमों में बहुसंख्यक पसमान्दा समुदाय एएमयू में नेतृत्व, रोजगार, और नीति-निर्माण से पूरी तरह वंचित है।
पूर्व छात्रों की मिलीभगत
दिल्ली, अलीगढ़ पैरेंट बॉडी एसोसिएशन, लखनऊ, रियाद और शिकागो के प्रभावशाली पूर्व छात्र जवाबदेही के बजाय नॉस्टैल्जिया चुनते हैं। उनकी मुशायरों और गोल्फ़ रीयूनियन में सर सैयद का गुणगान होता है, पर एएमयू की मंडी में तब्दील स्थिति को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वे मामूली NIRF रैंकिंग सुधार पर तालियां बजाते हैं, पर वैश्विक रैंकिंग में 1001–1200 तक की गिरावट को नहीं देखते।
उनकी चुप्पी ही इस सड़ांध की ताकत है।
वंश परंपरा की बेड़ियां तोड़नी होंगी
एएमयू के पतन को रोकने के लिए कठोर सुधार जरूरी हैं-
कार्रवाई का समय अब है
परिवार भारतीय संस्कृति में पवित्र हो सकता है, लेकिन भाई-भतीजावाद नहीं। एएमयू की भर्ती नीति ने दोनों को मिला दिया है और एक राष्ट्रीय संस्था को कुछ परिवारों की जागीर बना दिया है।
आंसू गैस, लाठीचार्ज और संस्थागत धोखे के बावजूद संघर्षरत एएमयू छात्र ही इस संस्था की अंतिम गरिमा हैं। वे एक ऐसी यूनिवर्सिटी के हकदार हैं जो योग्यता और ईमानदारी का सम्मान करे न कि संपर्कों के आधार पर नीलाम हो।
नोट: लेखक ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं-
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