मुझे आज भी याद है, इमरजेंसी के दौरान केरल के एक इंजीनियरिंग के छात्र राजन को पुलिस उठा ले गई और उसे शारीरिक यंत्रणा देकर, पीट-पीट कर मार डाला, उसकी लाश तक का किसी को पता ठिकाना न मिला। जब यह खबर लोगों तक पहुंची, पूरा देश स्तब्ध था। लोग पुलिस की क्रूरता-अत्याचार की बात करते, अधिकांश लोगों की सहानुभूति राजन के साथ थी। लोग नेताओं से गुस्सा थे, उन्हें बुरा-भला कह रहे थे।
राजनीति गरम थी, लोग तरह-तरह की विचारधारा के पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क कर रहे थे। परंतु कदाचित ही कोई उसके परिवार की बात कर रहा था। इन सबके बीच एक व्यक्ति बिल्कुल अलग तरीके से सोच रहा था। विलक्षण सोच का एक आदमी कुछ भिन्न सोच रहा था। प्रतिभावान व्यक्ति की सोच-समझ अधिकांश लोगों से अलग होती है।
कुछ साल बाद इस व्यक्ति ने अपनी सोच, सहानुभूति-तदानुभूति को कहानी की शक्ल दे दी और उसे परदे पर उतारा। इस फिल्म का नाम है, ‘पिरवी’। यह भी ध्यातव्य है कि यह इस आदमी की पहली फिल्म है। फिल्म को 15 पुरस्कार प्राप्त हुए।
फिल्म- ‘पिरवी’
जब अधिकांश लोग पुलिस क्रूरता, नेताओं की स्वार्थपरता की बात सोच रहे थे, इस व्यक्ति ने राजन के परिवार पर, उनकी भावनाओं-अनुभवों, उनके दु:ख-दर्द पर अपना ध्यान केंद्रित किया। फिल्म में राजन को रघु नाम दिया गया है। पूरी फिल्म न तो कभी रघु को दिखाती है और न ही पुलिस की क्रूरता को सामने लाती है। लेकिन दर्शक सारे समय उसकी उपस्थिति अनुभव करता है।
एक रिटायर्ड प्रोफेसर के एकमात्र बेटा रघु के गायब होने के बाद उसके 80 साल के पिता, मितियाबिंद से अंधी हुई मां और बहन का क्या हाल है, यही इस फिल्म का प्रतिपाद्य है। इस मार्मिक, संवेदनशील फिल्म के निर्देशक का नाम है, शाजी नीलकंठन करुणाकरण, प्रचलित नाम है, शाजी एन. करुण।
शाजी एन. करुण का जन्म 1 जनवरी 1950 को केरला के कोलम जिले में परिवार के बड़े बेटे के रूप में हुआ। पिता का नाम है एन. करुणाकरण एवं माता हैं चंद्रमति। जल्द ही ये लोग राजधानी तिरुअनंतपुरम् में आ बसे। वहीं कॉलेज से शाजी ने ग्रेजुएशन किया और 1971 में पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलेविजन संस्थान में सिनेमाटोग्राफी का प्रशिक्षण लेने पहुंच गए। उस साल 100 उम्मीदवारों में से मात्र 8 का चयन हुआ था। वहां से 1975 में उन्होंने स्वर्ण पदक के साथ डिप्लोमा पाया।
इसी साल अपने जन्मदिन पहली जनवरी को शाजी ने अपनी पड़ोसन अनुसुया से विवाह किया। अनिल एवं अप्पु इन दोनों के बेटे हैं। उनके भावी स्वसुर ने उन्हें पुणे जाने की सलाह दी थी। इसी समय केरल में राज्य फिल्म विकास कोरपोरेशन की स्थापना हुई। फिल्म संस्थान से निकलते ही शाजी को यहां अधिकारी बनने का अवसर मिला। शुरू में काफी समय तक वे मलयालम के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक जी. अरविंदन के सिनेमाटोग्राफर रहे।
अरविंदन की फीचर फिल्मों के अलावा उन्होंने ‘अरापेट्टा केट्टिया ग्रामतिल’, ‘पंचवटी पालम’, ‘माराट्टम’, कांचन सीता’, ‘तम्पु’, ‘कुम्मट्टी’, ‘एस्तापन’, ‘पंचगनी’, ‘फ्लैशबैक’, ‘द सीयर हू वॉक्स अलोन’, ‘ओरिदत्त’ आदि कुल 27 फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी की। उन्होंने अपने मेंटोर जी अरविंदन पर ‘ए ड्रीम टेक्स विंग्स: जी. अरविंदन’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई।