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दूसरा पहलू: एआई का इस्तेमाल करें, लेकिन इन्सान बने रहें

सार

मशीनें भले असाधारण काम कर रही हों, उनसे सम्मोहित होने की जरूरत नहीं। वे ऐसी हैं, क्योंकि मनुष्य ने उन्हें ऐसा बनाया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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वर्ष 1900 के करीब की बात है। जर्मनी में एक घोड़ा विज्ञान जगत में सेलिब्रिटी बन गया। उसका नाम था ‘क्लेवेर हंस’। उससे अगर पूछा जाता कि 14 और 12 कितने होते हैं, तो वह अपने खुर से 26 बार जमीन थपथपाता। पढ़े-लिखे लोगों ने उसे देखा, उसकी बाकायदा परीक्षा ली और पूरी गंभीरता से निष्कर्ष निकाला कि यह घोड़ा गिनती कर सकता है। फिर, मनोवैज्ञानिक ऑस्कर फंगस्ट ने एक आसान प्रयोग किया। उन्होंने ऐसी स्थिति बनाई, जिसमें सवाल पूछने वाले को जवाब ही पता न हो। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि हंस सवाल पूछने वाले का चेहरा न देख सके। दोनों बार हंस नाकाम रहा।
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असल में वह इन्सान के चेहरे पर होने वाले उन बेहद छोटे और अनजाने बदलावों को पढ़ रहा था, जो उसके खुरों की गिनती सही संख्या तक पहुंचने पर दिखाई देते थे। हंस वाकई असाधारण था, लेकिन उस क्षमता में नहीं, जिसकी लोग परीक्षा ले रहे थे। पिछले दो वर्षों में मैंने उस घोड़े के बारे में बहुत सोचा है, क्योंकि वह हमारी मौजूदा स्थिति को एआई पर लिखी गई ज्यादातर बातों से कहीं बेहतर तरीके से समझाता है। आज मशीनें तस्वीरों को वर्गीकृत कर सकती हैं, चैंपियनों को हरा सकती हैं, भाषाओं का अनुवाद कर सकती हैं, ठीक-ठाक गद्य लिख सकती हैं और आत्मविश्वास से सवालों के जवाब दे सकती हैं। ये नतीजे वास्तविक हैं। लेकिन, असली सवाल अब भी वही है, जो फंगस्ट ने पूछा था कि हम वास्तव में किस चीज की परीक्षा ले रहे हैं और मशीन वास्तव में कर क्या रही है?

एआई रिसर्च का ही एक उदाहरण लें। एक एआई सिस्टम वैज्ञानिक शोध-पत्रों में दिए गए डायग्राम से जुड़े सवालों के जवाब देने में बेहद अच्छा पाया गया। फिर किसी ने वही सवाल पूछे, लेकिन डायग्राम हटाकर। सिस्टम तब भी अच्छा प्रदर्शन करता रहा। सवालों में इस्तेमाल किए गए कुछ शब्द सही जवाबों से जुड़े हुए थे और मशीन ने उसी संकेत को पकड़ लिया था। जवाब सही था, लेकिन वजह गलत। यह अच्छे प्रयोग की बुनियादी प्रक्रिया है। इसके उलट, कंप्यूटर साइंस में प्रयोगात्मक तरीकों की ट्रेनिंग को अब भी उतनी अहमियत नहीं दी जाती। मनोवैज्ञानिकों के पास इसके लिए दो शब्द हैं-परफॉर्मेंस और कॉम्पिटेंस। किसी छात्र ने किताब से एक सवाल और उसका जवाब रट लिया हो, तो वह तब तक शानदार प्रदर्शन करेगा, जब तक सवाल में कोई संख्या न बदले। संख्या बदलते ही उसका प्रदर्शन गिर जाएगा, क्योंकि उसे उसकी वास्तविक समझ नहीं थी। सिस्टम भी सही जवाब दे सकता है, भले ही उसके पीछे वह समझ न हो, जिसकी हम उससे उम्मीद कर रहे हैं। वह ऐसा करने का कारण भी नहीं बताएग, क्योंकि वह खुद को हमसे बेहतर ढंग से समझ नहीं सकता।
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दरअसल, खतरा किसी ऐसी मशीन से नहीं है, जो अचानक चेतना हासिल कर ले, बल्कि उस मशीन से है, जिसका इस्तेमाल लापरवाही या जानबूझकर गलत तरीके से किया जाए। सिंथेटिक वीडियो और ऑडियो अब इतने बेहतर हो चुके हैं कि किसी इन्सान को ऐसे कमरे में दिखाया जा सकता है, जहां वह कभी गया ही नहीं, और उससे ऐसे शब्द कहलवाए जा सकते हैं, जो उसने कभी बोले ही नहीं। ऐसे फर्जी कंटेंट को पहचानना हमेशा चुनौती रहेगी। भारत के लिए यह कोई दूर की या काल्पनिक समस्या नहीं है। इसीलिए, किसी भी सिस्टम को लागू करने से पहले तीन सवाल जरूर पूछे जाने चाहिए। पहला, इससे किसे फायदा होगा? दूसरा, कुछ गलत हुआ, तो उसका जोखिम कौन उठाएगा? और तीसरा, इसे बदलने या बंद करने का अधिकार किसके पास होगा? जो सिस्टम किसी इन्सान की जिंदगी से जुड़ा अहम फैसला लेता है, उसके फैसले की वजह उस व्यक्ति को समझाई जा सकनी चाहिए।

एक और बात। बच्चे लगातार ‘क्यों’ पूछते हैं। यह इन्सानी जिज्ञासा की पुरानी आदत है। पर, जब मशीनें तुरंत, धाराप्रवाह व भरोसेमंद लगने वाले जवाब देने लगती हैं, तो वे इस आदत को धीरे-धीरे खत्म कर सकती हैं और नतीजों के पीछे जाने की हमारी इच्छा भी। ऐसे में, चुनौती यह नहीं कि हम इन सिस्टम्स से डरें या उनकी पूजा करने लगें, बल्कि सवाल उठाना, जवाबों की जांच करना, उनकी सीमाओं को समझना और फिर फैसला लेना है। फंगस्ट को इसमें कोई संदेह नहीं था कि हंस एक असाधारण घोड़ा था। वह सिर्फ यह जानना चाहते थे कि वह आखिर कर क्या रहा था। इसलिए, एआई का इस्तेमाल करें। सवाल पूछें। लेकिन, सबसे जरूरी बात, इन्सान बने रहें।

-लेखक टेक, सोशल आंत्रप्रेन्योर और डब्ल्यूजीएफ के प्रोग्राम डायरेक्टर (पूर्वी भारत) हैं।


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यह एक ऐसा टूल है, जिसकी मदद से उपयोगकर्ता अपने काम को एक ही जगह पर आसानी से व्यवस्थित और प्रबंधित कर सकता है। इसमें काम को व्यवस्थित करने के लिए बोर्ड बनाए जाते हैं, जिनके भीतर अलग-अलग सूचियां और कार्ड बनाए जा सकते हैं। मसलन, किसी प्रोजेक्ट के लिए ‘करना है’, ‘काम चल रहा है’ और ‘काम पूरा हो गया’ जैसी सूचियां बनाई जा सकती हैं। इसकी मदद से लंबे विवरण व बातचीत का छोटा एवं आसान सारांश तैयार किया जा सकता है। इससे पूरी बातचीत पढ़ने में समय नहीं लगाना पड़ता और तुरंत पता चल जाता है कि काम किस स्थिति में है और प्रोजेक्ट कितना आगे बढ़ चुका है।
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