हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां मानव बुद्धि का विकास हमारी नैतिक परिपक्वता से कहीं आगे निकल गया है। हम जो भी उपकरण और तकनीक बनाते हैं, उसमें तरक्की और विनाश, दोनों की संभावनाएं छिपी होती हैं। हम मशीनों को देखते हैं और उनमें अपनी बुद्धि की अद्भुत क्षमता का प्रतिबिंब पाते हैं। हमने पुल बनाए और ऐसे संचार माध्यम विकसित किए, जिन्होंने पूरी दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। तकनीक ने हमें देवताओं जैसी शक्ति प्रदान कर दी है, लेकिन हम अक्सर उस शक्ति का उपयोग बच्चों जैसी अपरिपक्वता के साथ करते हैं। इसलिए, हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम अपनी बनाई हुई तकनीक पर नियंत्रण रख रहे हैं, या धीरे-धीरे वही तकनीक हमारे जीवन को नियंत्रित करने लगी है?
यदि हम ऑटोमेशन (स्वचालन) के माध्यम से जीवन की प्रत्येक कठिनाई को समाप्त कर दें, तो अनजाने में हम उस संघर्ष को भी समाप्त कर सकते हैं, जो मनुष्य की कल्पनाशीलता और प्रतिभा को जन्म देता है। कठिनाइयों से रहित जीवन, विकास से भी रहित हो सकता है। अत्यधिक आराम अक्सर आत्मसंतोष को तो जन्म दे सकता है, लेकिन वही आत्मसंतोष अंततः पतन का कारण भी बन सकता है।
विज्ञान और तकनीक मानव जिज्ञासा की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं। इन्हीं के जरिये हम भविष्य के नए रास्तों की खोज करते हैं। ऐसे में, प्रश्न यह नहीं कि प्रगति कैसे की जाए, बल्कि यह है कि उसे सही दिशा कैसे दी जाए। इसलिए, हमें सुनिश्चित करना होगा कि मशीनी तरक्की इन्सानी जिंदगी को बेहतर बनाए, न कि कमतर।
हम एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं, जहां अगर तकनीक की रफ्तार हमारी नैतिक समझ से आगे निकल गई, तो प्रगति विनाश का कारण बन सकती है। पर, अगर हमने तकनीकी क्षमता को सामूहिक विवेक और नैतिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ा, तो यही हमें अपनी मौजूदा सीमाओं से कहीं आगे ले जा सकती है।