बताते हैं कि अगस्ता वेस्टलैंड सौदे से पहले मनमोहन सिंह सरकार ने एक शर्त यह रखी थी कि इसमें किसी बिचौलिए को शामिल नहीं किया जाएगा।
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अगस्ता वेस्टलैंड मामले में पीएम की शर्त
बताते हैं कि अगस्ता वेस्टलैंड सौदे से पहले मनमोहन सिंह सरकार ने एक शर्त यह रखी थी कि इसमें किसी बिचौलिए को शामिल नहीं किया जाएगा। अगर किसी बिचौलिए के इसमें शामिल होने की बात पता चलेगी, तो सौदा रद्द मान लिया जाएगा। मगर सौदा होने के कुछ समय बाद ही इसमें रिश्वत देने की बात उठी थी। इस पर तुरंत इटली की जांच एजेंसी ने अगस्ता वेस्टलैंड और उसकी मातृ संस्था फिनमेकेनिका के खिलाफ जांच शुरू कर दी और पाया कि इसमें दस प्रतिशत यानी तीन सौ साठ करोड़ रुपए रिश्वत दी गई थी।
इस जांच के आधार पर यूपीए सरकार ने तुरंत सौदा रद्द कर दिया और कंपनी की तरफ से जमानत के तौर पर जमा कराए धन पैसे की भरपाई कर ली थी। अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर डील में कथित घोटाले की जांच के लिए दिल्ली की अदालत ने बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल को सीबीआई की कस्टडी में सौंप दिया है।
मिशेल के भारत आने के बाद से ही बीजेपी और कांग्रेस एक दूसरे पर हमलावर नजर आ रही हैं। इस विवाद ने पिछले दिनों तब और तूल पकड़ लिया जब यूथ कांग्रेस के लीगल सेल के इंचार्ज ऐडवोकेट एल्जो जोसेफ मिशेल की तरफ से कोर्ट में पेश हुए। बीजेपी ने मामले को उछाला, तो कांग्रेस ने इसे जोसेफ का व्यक्तिगत फैसला बताते हुए उन्हें यूथ कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि राफेल डील में हुए घोटाले से ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार मिशेल का इस्तेमाल कर रही है और उसने यूपीए द्वारा ब्लैकलिस्ट की गई अगस्टा/फिनमेकेनिका को प्रमोट करते हुए उसे काम दिया है।
बता दें कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने पिछले कुछ महीनों से मोदी सरकार को राफेल डील पर घेर रखा है। अब मिशेल के सफल प्रत्यर्पण ने बीजेपी को भी पलटवार का मौका दिया है।
दरअसल, अगस्ता वेस्टलैंड डील मामला यूपीए काल का है। जांच एजेंसियां इस सौदे में मिशेल और अन्य दो बिचौलियों द्वारा भारतीय नेताओं व अफसरों को रिश्वत देने के मामले की जांच कर रही हैं। ऐसे में अब इस बात के आसार साफ नजर आ रहे हैं कि 2019 आम चुनावों से पहले संसद के शीतकालीन-सत्र में बीजेपी, कांग्रेस के बीच अगस्ता बनाम राफेल की जंग देखने को मिलेगी।
दरअसल, अगस्ता वेस्टलैंड डील मामला यूपीए काल का है। जांच एजेंसियां इस सौदे में मिशेल और अन्य दो बिचौलियों द्वारा भारतीय नेताओं व अफसरों को रिश्वत देने के मामले की जांच कर रही हैं।
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कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने
कांग्रेस और बीजेपी के बीच इस भिड़ंत की शुरुआत भी हो चुकी है। दक्षिणपंथी विचारक एस गुरुमुर्ती ने मिशेल की तरफ से कोर्ट में पेश हुए एल्जो जोसेफ को सीधे तौर पर गांधी परिवार से ही जोड़ दिया है। गुरुमुर्ति ने ट्वीट कर इसे सोनिया फैमिली द्वारा घोटाले में शामिल होने का एक तरह से कबूलनाम तक बता डाला। बीजेपी आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने भी इस मुद्दे पर ट्वीट कर कांग्रेस को घेरा। हालांकि जोसेफ ने पार्टी द्वारा एक्शन लिए जाने से पहले अपनी सफाई में कहा था कि वह अपने प्रोफेशनल क्षमताओं के लिए मिशेल की तरफ से पेश हुए थे, इसका कांग्रेस पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने मिशेल के प्रत्यर्पण को राफेल डील में घोटाले के आरोपों से बचने का रास्ता बताया है। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने विपक्ष को काउंटर करने के लिए मिशेल का प्रत्यर्पण कराया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर पलटवार करते हुए उसे यूपीए द्वारा ब्लैकलिस्ट की गई अगस्ता/फिनमेकेनिका कंपनी का 'प्रोटेक्टर और प्रमोटर' बताते हुए उसे खरीदारी के बडे़ ऑर्डर देने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि मोदी सरकार बैन कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड/फिनमेकेनिका की मदद करने में अपनी भूमिका छिपाने के लिए इस साजिश में जुटी है। सुरेजवाला ने कहा कि मिशेल पहले ही आरोप लगा चुका है कि मोदी सरकार उसे इस मामले से निकालने की शर्त पर सोनिया गांधी का नाम लेने का दबाव बना रही थी।
दरअसल, अगस्ता वेस्टलैंड को लेकर आखिर यह सवाल अनुत्तरित है कि इस सौदे में जिन लोगों ने रिश्वत खाई, वे कौन हैं। यों तत्कालीन वायुसेना प्रमुख को भी इसमें आरोपी बनाया गया था। मगर सौदे को मंजूरी देते वक्त तत्कालीन सरकार के कुछ मंत्री भी शामिल थे। उनमें से किनके जरिए मिशेल ने हेलिकॉप्टर सौदे को प्रभावित करने की कोशिश थी, इसे जानना जरूरी है।
राफेल मामले की सच्चाई क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा
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रक्षा सौदों में बिचौलियों की भागीदारी नई बात नहीं
रक्षा सौदों में बिचौलियों की भागीदारी नई बात नहीं है। पर चूंकि बोफर्स आदि मामलों में कांग्रेस अपना हाथ पहले ही जला चुकी थी, इसलिए सावधानी बरतते हुए अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद में मनमोहन सिंह सरकार ने शर्त रखी थी कि इसमें किसी बिचौलिए की मदद नहीं ली जाएगी। फिर भी मिशेल और दो अन्य लोग यहां के कुछ नेताओं और सेना अधिकारियों को प्रभावित करने में कामयाब रहे, तो उन लोगों के नाम उजागर होना जरूरी है। आखिर जो रिश्वत उन्होंने खाई उसकी भरपाई भी होनी है।
बहरहाल, अगस्ता को लेकर सरकार और उससे जुड़े लोग जिस तरह से उत्साहित हैं, उसे देख यही कहा जा सकता है कि उन्हें राफेल की परिणति का अंदाजा नहीं है। राफेल मामले की सच्चाई क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन राफेल के मसले पर भी चर्चा और बहस होनी चाहिए। सरकार को इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्योंकि देश जानना चाहता है कि राफेल सौदे की हकीकत क्या है। देखना है कि क्या होता है?
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