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कोरोना से जंग: मुंबई-सूरत ही नहीं, मध्य प्रदेश के गांव-गांव में फंसे हैं खेतिहर मजदूर

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चैतुए मजदूर मप्र के कई जिलों में फंसे हुए हैं - फोटो : अमर उजाला
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पहले दिल्ली और सूरत, मुंबई में फंसे मजदूरों की परेशानी लॉकडाउन ने और बढ़ा दी है और प्रधानमंत्री के ऐलान के कुछ ही घंटों के भीतर मायानगरी मुंबई से लेकर टेक्सटाइल नगरी सूरत तक से मजदूरों की भीड़ अपने अपने राज्य और गांव जाने के लिए उमड़ती हुई टेलीविजन के स्क्रीन पर खबरिया चैनलों में दिखने लगी।

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इसे लेकर सवाल भी उठने लगे कि ये मजदूरों के बीच अफवाह फैलाने की साजिश तो नहीं और यह भी कि मजदूर काम नहीं मिलने और भोजन तथा रुकने के अपर्याप्त और असम्मानजनक इंतजाम से छटपटा कर मजदूर घर जाने के लिए कुछ भी करने को आमादा हैं। यह सच है कि बातों से काम नहीं चलता, पहली दफा ऐसे हालात से रूबरू सरकारें और तंत्र भी एक स्तर पर कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं। 

लॉकडाउन के दूसरे चरण में पहले चरण के दौरान आई दिक्कतों को तुरंत दूर करने की जरूरत है। सरकार के स्तर पर भी और समाज के स्तर पर भी। लेकिन महानगरों और छोटे शहरों के अलावा गांवों में भी एक समस्या विकराल होने की तरफ अग्रसर है। वह है पहले फसल काटने में आ रही मुश्किलें और अब कुछ राहत मिली है तो बाहर जिलों या प्रांतों से आए फसल काटने वाले खेतिहर मजदूर। इन सीजनल मजदूरों को मप्र के अंचलों में चैतुए कहा जाता है।
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ये फरवरी मार्च में यानी फागुन के महीने में आते हैं और मार्च, अप्रैल से मई तक यानी चैत से वैशाख की शुरुआत तक गेहूं की फसल की कटाई का काम करते हैं। इस मजदूरी में उन्हें गेहूं मिलता है। वे उसे लेकर अपने अपने घरों को लौट जाते हैं। इससे उनके साल भर का गेहूं का इंतजाम हो जाता है और वे राहत महसूस करते हैं। मप्र के कई अंचलों में लॉकडाउन ने इन चैतुए को भी फंसा दिया है। शहरों में लॉकडाउन लागू करवाने और जिलों की सीमाएं सील करने में लगे प्रशासन को इन चैतुओं की फिक्र ही नहीं है।                                                                                                                  
मप्र के जिलों में फंसे हैं दूसरे जिलों से आए मजदूर चैतुए
मप्र के प्रचुर गेहूं उत्पादन वाले जिलों विदिशा, रायसेन, हरदा, सीहोर, भोपाल सहित करीब एक दर्जन से ज्यादा जिलों में  फरवरी के अंत और मार्च माह के आरम्भ में ही सीधी, शहडोल, उमरिया, सतना, कटनी आदि जिलों से चैतुये यहां के किसानों की फसलें काटने की मजदूरी के लिए आते हैं।

यह सिलसिला साल दर साल चला आ रहा है। ये सभी अत्याधिक गरीब लोग होते हैं। इनमें ज्यादातर अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति एवं अन्य जातियों के गरीब तबके के महिला पुरुष और बच्चे होते हैं। एक दशक पहले तक ये मसूर चना गेहूं की फसलें न केवल काटते थे बल्कि खलिहानों में भी मजदूरी करते थे। किसानों के खलिहान उठाने के बाद यही लोग किसानों के खेतों में 'पारें' (मेढ़ बंधान) भी डालते थे।

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इस साल फसल लेट होने से भी बनी मुसीबत

चैतुए मजदूर कई गांवों में फंसे हुए हैं। - फोटो : अमर उजाला
बीते कुछ वर्षों से सरकार की सस्ते या मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की योजनाएं और पूर्व में पिछड़े रहे अंचलों में भी सिंचाई सुविधा बढ़ जाने से खेती बेहतर होने से वहां से खेतिहर मजदूरों का पलायन कम तो हुआ है लेकिन अब भी वे चैत काटने के लिए आते हैं। उन्हें अब उतना काम भी गेहूं बहुल जिलों में नहीं मिलता।

अब हार्वेस्टर और भूसा बनाने की आधुनिक मशीनों की सहज उपलब्धता के कारण बड़े किसान गेहूं कटवाने के लिए इन पर निर्भर नहीं रह गए हैं। इसलिए अब केवल मसूर और चना का चैत करके दुर्गाष्टमी के पहले ही अपने घरों को रवाना हो जाते हैं और देवी-पूजन अपने घरों पर ही सम्पन्न करते हैं। लेकिन इस वर्ष असमय वर्षा के कारण कटाई लेट शुरू हुई और ये लोग लौट कर घर जा पाते उसके पहले ही कोरोना वायरस के कारण देश में लॉकडाउन हो गया, जिसके कारण गांव-गांव में फंसे हुए हैं। 

इनके साथ ही हार्वेस्टर चलाने वाले पंजाब के मजदूर भी हैं। इनकी भी खासी संख्या है। घर पर बूढ़े मां-बाप अकेले हैं। कुछ के पास घरों पर पालतू पशु भी हैं। इन खेतिहर मजदूरों को अपने गांव लौटने की चिंता सताने लगी है।

दिल्ली, मुंबई और सूरत  के आप्रवासी मजदूरों के घरों की और लौटने की तस्वीरें पूरा देश देख रहा है। मप्र के गांवों से भी ऐसे ही दृश्य सामने आने की आशंका है। इन अल्पकालीन खेतिहर मजदूरों का धैर्य भी अब डिग रहा है। वे भी अब अपनी कमाई और सामान सिरों पर रख कर पैदल ही गांवों की ओर कूच कर सकते हैं। जो किसान इन्हें लेकर आए थे, अभी तक तो वही इनके खाने-पीने की व्यवस्था कर रहे हैं, लेकिन आखिर कब तक यह हो सकेगा, कहना मुश्किल है। सरकार को इनकी सुध लेकर सीमित संख्या में क्रमश: इन्हें अपने गांवों तक भेजने के इंतजाम का तुरंत फैसला करना चाहिए।   .
       
अभी गांवों में किसान ऐसे कर रहे हैं इनकी मदद
यदि किसी किसान के पास 30 चैतुए हैं तो एक क्विंटल गेहूं तीन दिनों के दोनों समय के भोजन के लिए चाहिए। प्रत्येक पंचायत में 300 से लेकर 400 तक ये मजदूर हैं। किसान अब यह खर्च उठाने में खुद को सक्षम नहीं पा रहे हैं। किसानों का कहना है कि लॉकडाउन बढ़ने से उन पर बोझ बढ़ गया है, ऐसे में वे खुद आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। सरकार गांवों में फंसे इन खेतिहर मजदूर चैतुओं की मदद नहीं करेगी तो हालात खराब हो सकते हैं। सरकार इन्हें अपने घरों तक पहुंचाने का प्रबंध करे।   

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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