चैतुए मजदूर कई गांवों में फंसे हुए हैं।
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बीते कुछ वर्षों से सरकार की सस्ते या मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की योजनाएं और पूर्व में पिछड़े रहे अंचलों में भी सिंचाई सुविधा बढ़ जाने से खेती बेहतर होने से वहां से खेतिहर मजदूरों का पलायन कम तो हुआ है लेकिन अब भी वे चैत काटने के लिए आते हैं। उन्हें अब उतना काम भी गेहूं बहुल जिलों में नहीं मिलता।
अब हार्वेस्टर और भूसा बनाने की आधुनिक मशीनों की सहज उपलब्धता के कारण बड़े किसान गेहूं कटवाने के लिए इन पर निर्भर नहीं रह गए हैं। इसलिए अब केवल मसूर और चना का चैत करके दुर्गाष्टमी के पहले ही अपने घरों को रवाना हो जाते हैं और देवी-पूजन अपने घरों पर ही सम्पन्न करते हैं। लेकिन इस वर्ष असमय वर्षा के कारण कटाई लेट शुरू हुई और ये लोग लौट कर घर जा पाते उसके पहले ही कोरोना वायरस के कारण देश में लॉकडाउन हो गया, जिसके कारण गांव-गांव में फंसे हुए हैं।
इनके साथ ही हार्वेस्टर चलाने वाले पंजाब के मजदूर भी हैं। इनकी भी खासी संख्या है। घर पर बूढ़े मां-बाप अकेले हैं। कुछ के पास घरों पर पालतू पशु भी हैं। इन खेतिहर मजदूरों को अपने गांव लौटने की चिंता सताने लगी है।
दिल्ली, मुंबई और सूरत के आप्रवासी मजदूरों के घरों की और लौटने की तस्वीरें पूरा देश देख रहा है। मप्र के गांवों से भी ऐसे ही दृश्य सामने आने की आशंका है। इन अल्पकालीन खेतिहर मजदूरों का धैर्य भी अब डिग रहा है। वे भी अब अपनी कमाई और सामान सिरों पर रख कर पैदल ही गांवों की ओर कूच कर सकते हैं। जो किसान इन्हें लेकर आए थे, अभी तक तो वही इनके खाने-पीने की व्यवस्था कर रहे हैं, लेकिन आखिर कब तक यह हो सकेगा, कहना मुश्किल है। सरकार को इनकी सुध लेकर सीमित संख्या में क्रमश: इन्हें अपने गांवों तक भेजने के इंतजाम का तुरंत फैसला करना चाहिए। .
अभी गांवों में किसान ऐसे कर रहे हैं इनकी मदद
यदि किसी किसान के पास 30 चैतुए हैं तो एक क्विंटल गेहूं तीन दिनों के दोनों समय के भोजन के लिए चाहिए। प्रत्येक पंचायत में 300 से लेकर 400 तक ये मजदूर हैं। किसान अब यह खर्च उठाने में खुद को सक्षम नहीं पा रहे हैं। किसानों का कहना है कि लॉकडाउन बढ़ने से उन पर बोझ बढ़ गया है, ऐसे में वे खुद आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। सरकार गांवों में फंसे इन खेतिहर मजदूर चैतुओं की मदद नहीं करेगी तो हालात खराब हो सकते हैं। सरकार इन्हें अपने घरों तक पहुंचाने का प्रबंध करे।
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