अग्निपथ योजना का विरोध
- फोटो : Pixabay
खड़े हैं कई सारे सवाल?
क्या भरी जवानी में वो सड़क पर होंगे? जो सेना या दूसरे सशस्त्र बलों में नहीं जा सकेंगे, वो क्या करेंगे? खतरा यह भी है कि कुछ सैन्य प्रशिक्षित युवा गलत रास्तों पर भी जा सकते है। चार साल की सेवा के दौरान जिनकी शादियां वगैरह हो जाएंगी, उनका पारिवारिक दायित्व भी बढ़ जाएगा। जिंदगी उन्हें नए सिरे से शुरू करनी होगी। अगर यही होना है तो वो अग्निवीर क्यों बनें?
बेशक सरकार की यह योजना कोई अनिवार्य सैन्य सेवा नहीं है। जिसे शर्तें सूट करती हों, वो अग्निवीर बने। उसके सामने दूसरे विकल्प भी खुले हैं। लेकिन जो सेवा शर्तों से असहमत है, उसे हिंसक प्रदर्शन करने का कोई अधिकार नहीं है। हालांकि आंदोलनकारी युवाओं का कहना है कि अग्निपथ योजना की सेवा शर्तें उनके ‘रोजगार के अधिकार का हनन’ है।
भारतीय संविधान में काम का अधिकार किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है। ऐसे में अग्निपथ योजना पर उठा विवाद कोर्ट में भी जा सकता है।
अहम सवाल यह भी है कि सरकारी नौकरियों को लेकर युवा इतने ज्यादा संवेदनशील क्यों हैं? क्यों उनके लिए यह जीने-मरने का सवाल बन जाता है? जबकि देश की कुल आबादी के महज 4 फीसदी को ही सरकारी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी मिल पाती है। इसका एक मात्र कारण सरकारी का नौकरी का सर्वाधित सुरक्षित होना, संवैधानिक अधिकार मिलना, पब्लिक में रूआब होना और यथा संभव भ्रष्टाचार की गुंजाइश होना भी है।
अमूमन बिहार और यूपी में बड़े पैमाने पर सेना व अन्य सरकारी नौकरियों की भर्ती परीक्षा पास करने के लिए युवा कोचिंग लेते हैं। पिछले दिनों रेलवे भर्ती में कथित धांधली के विरोध में उभरे युवा हिंसक प्रतिरोध के पीछे कोचिंग माफिया को भी एक कारण बताया गया था। हर प्रतियोगी परीक्षा और उसके ताने-बाने से उनके अपने आर्थिक हित जुड़े होते हैं। इसमें कोई भी बदलाव कोचिंग माफिया के हितों को प्रभावित करता है।
हिंसा के पीछे की साजिश
अग्निपथ योजना मामले में भी जिस तेजी से युवाओं में प्रतिरोध फैला, बड़े पैमाने पर तेजी से इकट्ठा होकर युवा सड़कों पर उतर आए और हिंसा भी शुरू कर दी, यह बिना किसी नेटवर्क के संभव नहीं है। सोशल मीडिया की इसमें बहुत बड़ी और नकारात्मक भूमिका है।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि युवाओं की आवाज को खारिज कर दिया जाए। उनका विरोध और मांग जायज हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक सम्पत्ति को स्वाहा करना, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ कर अपने आक्रोश को जायज ठहराने की कोशिश सर्वथा अस्वीकार्य है। ऐसी मानसिकता के लोग सेना या सुरक्षा बलों के लायक कैसे हो सकते हैं ?
एक अहम सवाल ये भी है कि ‘अग्निवीरों’ के साथ खुद सेना के भीतर किस तरह का व्यवहार होगा? क्या वो दोयम दर्जे के सैनिक होंगे या उन्हें पूर्णकालिक सैनिक के समान जिम्मेदारियां और अवसर मिलेंगे? सेना खुद उन पर कितना भरोसा करेगी? गोपनीय अभियानों में उन्हें शामिल किया जाएगा या नहीं? अग्निवीर इतनी कम अवधि में स्वयं को सेना के चरित्र में कितना ढल पाएगा? या उसकी स्थिति ‘होमगार्ड’ जैसी ही रहेगी? इनके जवाब अभी मिलने हैं।
वैसे योजना के पक्षधरों का कहना है कि आज वैश्विक और भारत की भू-राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए पहली जरूरत भारतीय सेना को ‘युवा’ बनाने की है। अब बड़ी संख्या के बजाए छोटी मगर कार्यक्षमता और तकनीकी रूप से दक्ष सेना की आवश्यकता ज्यादा है। ‘अग्निवीर’ उसी दिशा में बड़ा और सामयिक कदम है।
भविष्य में जो सेना की अपेक्षा के अनुरूप नहीं होंगे, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना अब ज्यादा आसान होगा, क्योंकि सेना देश सेवा का माध्यम है न कि पक्की नौकरी की गारंटी। अब लड़ाइयां आमने-सामने की जगह टैक्नोलाॅजी से ज्यादा लड़ी जा रही हैं। हमें भारतीय सेना को उसी के अनुरूप बनाना है। हालांकि इस पूरी योजना को लेकर सेना में भी दो तरह की राय हैं।
एक वर्ग इसे भारतीय सेना की कार्यशैली और क्षमता में जरूरी सामयिक बदलाव का प्रतीक मानता है तो दूसरा इसे सेना के मूलभूत चरित्र और तानेबाने से खतरनाक छेड़छाड़ के रूप में देखता है, जिसके नतीजे विपरीत भी आ सकते हैं।
‘अग्निपथ’ पर राजनीति भी हो रही है। विपक्ष ने मोदी सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा है कि खर्चो में कटौती के लिए सेना ही निशाने पर क्यों? सवाल कई हैं। लेकिन फिलहाल तो अग्निपथ योजना का पथ शुरू में ही सुलगता दिख रहा है। यह योजना भारतीय सेना को कितना सक्षम बनाएगी यह तो चार साल बाद ही पता चलेगा।
बहरहाल योजना की खामियों पर बात हो सकती है, लेकिन उसके उग्र विरोध का कोई औचित्य नहीं दिखता। कृषि कानूनों की तरह सरकार के लिए सबक यह है कि ऐसी कोई भी महत्वाकांक्षी योजना लागू करने के पहले उस पर व्यापक जनमत बनाना और संदेहों को समय रहते दूर करना जरूरी है। उम्मीद की जाए कि इस योजना का हश्र कृषि कानूनों की तरह नहीं होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।