हमारी आनंद आज की होगी, इसलिए इसमें नायक के दर्द को ख़ास तरीके से दिखाया जाएगा। वह रेलवे पटरी के पास ग़मगीन खड़ा है। अपनी बीमारी को याद कर गा रहा है, 'ज़िंदगी, कैसी है थकेली हाय।'
पटरी से लगी दीवार पर बाबू मोशाय के चित्र के साथ 'खोई हुई ताकत और जवानी फिर से पाएं' वाला विज्ञापन दिख रहा है। उफ़ ! कितना जबरदस्त कंट्रास्ट उतरेगा इस दृश्य से नायक की दशा और डॉ. बैनर्जी के किरदार की विवशता का।
'विवशता' के फैक्टर को और सजीव करने के लिए बैनर्जी के विज्ञापन के ठीक बगल में फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का पोस्टर भी दिखाया जा सकता है।
ऋषिकेश मुख़र्जी तो दकियानूसी थे। उन्होंने 'आनंद' में 'ना जिया लागे ना' वाला गीत गाते समय नायिका को नायक के घर की सफाई करते हुए दिखा दिया। धत! हमारी आनंद प्रोग्रेसिव किस्म की होगी।
गीत के ठीक पहले नायक घर के लिए बाथटब खरीद कर लाएगा। वह नायिका से आग्रह करेगा कि बाथटब का विधिवत उद्घाटन करे। तब नायिका घर की सफाई छोड़ शारीरिक स्वच्छता पर ध्यान देते हुए टब में स्नान करती हुई यह गीत गाएगी।
नायक पूरे समय तौलिया हाथ में लिए इस बात का इंतज़ार करेगा कि कब गीत ख़त्म हो और कब अगली टब से बाहर निकले। मुझे पूरा विश्वास है कि नायिका के स्नान से निर्वृत्त होने के बाद वाले दृश्य से दर्शकों को यह सन्देश सार्थक रूप में दिया जा सकेगा कि इंतज़ार का फल वाकई मीठा होता है।
अभी-अभी एक दोस्त का फोन आया। वह पूछ रहा है कि क्या रीमेक के अंत में भी आनंद की मौत हो जाएगी? मैंने उसे बताया, 'मूल फिल्म में आनंद का चरित्र मरा था, रीमेक में शायद पूरी की पूरी आनंद फिल्म को ही मार डाला जाएगा।' आपका इस बारे में क्या सोचना है?
उत्तर देने से पहले यदि आप संजय लीला भंसाली की 'देवदास' रामगोपाल वर्मा की 'आग' ('शोले' का रीमेक) और जेपी दत्ता की 'उमराव जान' देख लें तो बहुत संभव है कि आप भी 1971 वाले आनंद की 51 साल बाद की जाने वाली हत्या की आशंका से दहल उठेंगे।
(1971 वाली 'आनंद' की यूनिट से क्षमायाचना सहित)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।