यूनियन कार्बाइड की उस हत्यारी मिथाइल आइसोसाईनेट गैस के असर से भोपाल के हज़ारों परिवारों की अनेक पीढ़ियां अब तक ज़हर का दंश झेल रही हैं। यह जब्बार का ही जज़्बा था कि भोपाल मेमोरियल अस्पताल की स्थापना कराई और लाखों पीड़ितों के लिए अत्याधुनिक चिकित्सा मुहैया कराई। गैस पीड़ित महिलाओं को रोज़गार दिलाने के लिए सिलाई सेंटर खोले और उनके घरों में चूल्हा जलवाया। बरसों तक ज़हरीली गैस के शिकार मरीज़ों के लिए मुआवजे की लड़ाई लड़ी।
यूनियन कार्बाइड के मुज़रिमों को अपराधी क़रार देने के लिए सर्वोच्च अदालत तक उनका संघर्ष बेमिसाल है। दुनिया भर के नियम क़ायदे-क़ानून उन्हें ज़बानी याद थे। मैंने करीब सत्रह-अठारह साल तक गैस त्रासदी पर लिखा। सारे घटनाक्रम कवर किए और टेलीविज़न के लिए रपटें बनाईं। जब भी कोई संशय होता,जब्बार भाई उनका निवारण करते। हम जब्बार पर भरोसा कर सकते थे,सरकार पर नहीं। जो आंकड़े उनके पास होते, वे किसी विभाग के पास नहीं होते। एक तरह से वे एन्साइक्लोपीडिया थे।
पांच बरस पहले राज्यसभा टीवी के लिए एक वृत्तचित्र बना रहा था तो उन्होंने तीस साल की फिल्म आंखों के सामने चला दी थी। दशकों से हर शनिवार भोपाल के यादगारे शाहजहानी पार्क में गैस पीड़ित इकट्ठे होते रहे हैं और हर सप्ताह के सुख दुःख बांटते रहे हैं। अब जब्बार भाई नहीं हैं तो पीड़ित एक तरह से अनाथ हो गए हैं। अपनी आंखों के सामने ऐसे लोगों को पद्म सम्मान मिलते देख रहा हूं कि ताज्जुब होता है। दुनिया की सबसे भीषण और भयावह त्रासदी का शिकार लोगों के लिए सारे विश्व भर में इकलौता संघर्ष न किसी राज्य सरकार को दिखाई दिया न केंद्र सरकार को।
जब्बार भाई ! आप हमारे दिल में हमेशा बसे रहेंगे।
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