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दूसरा पहलू: सामाजिक सुधार की मिसाल बनता एक गांव; हिमाचल प्रदेश के टोरू गांव ने बनाई अलग पहचान

Mon, 02 Mar 2026 08:07 AM IST
Pavan केएस तोमर

सार

हिमाचल प्रदेश का टोरू गांव अपने सामूहिक व ऐतिहासिक सामाजिक सुधारों की वजह से आज देश भर में एक अलग पहचान बना चुका है। टोरू ने एक समिति बनाने का संकल्प भी लिया है, जो परामर्श देने, सचेत करने व आवश्यकता पड़ने पर दंड लगाने के लिए अधिकृत है। खास बात यह है कि इन सुधारों के लिए किसी वित्तीय बजट, विधायी समर्थन या प्रशासनिक मशीनरी की आवश्यकता नहीं है। ये पूरी तरह से आपसी सहमति, नैतिक साहस और सामूहिक जवाबदेही पर टिके हैं।
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सामाजिक सुधार की मिसाल बनता एक गांव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का टोरू गांव आज देश भर में एक अलग पहचान बना चुका है। 100 प्रतिशत साक्षरता, गांव के एक निवासी का सांविधानिक पद तक पहुंचना, और सामाजिक संरचना जैसी उपलब्धियां इसे खास बनाती हैं। लेकिन टोरू की असली पहचान किसी एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि सामूहिक और ऐतिहासिक सामाजिक सुधार का साहसिक निर्णय है।
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11 जनवरी, 2026 को टोरू गांव ने वह कदम उठाया, जिसे अक्सर सरकारें टालती हैं। सबसे प्रभावशाली निर्णयों में से एक था-भव्य दावतों और पाल्टोज पार्टियों पर लगाम लगाना। ये आयोजन एक तरह की प्रतिस्पर्धी प्रदर्शनी बन गए थे, जो परिवारों को अपनी हैसियत से कहीं अधिक खर्च करने पर मजबूर करते थे। एक बड़ा सुधार ‘दशउठान’ समारोह के पुनर्गठन में भी दिखता है। इस रस्म को केवल पहले बच्चे के जन्म तक सीमित करना और चाहे वह लड़का हो या लड़की, दोनों को समान सम्मान देना, सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक सोच पर एक कड़ा प्रहार है। शादियों में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध और गांव के भीतर इसकी बिक्री पर रोक लगाई गई है।

टोरू ने एक प्रतिनिधि कार्यान्वयन समिति बनाने का संकल्प भी लिया है, जिसमें बुजुर्ग, युवा और महिलाएं शामिल हैं। यह समिति परामर्श देने, सचेत करने और आवश्यकता पड़ने पर उचित सामाजिक दंड लगाने के लिए अधिकृत है। हालांकि, इसकी भूमिका दंडात्मक होने के बजाय सुधारात्मक अधिक है। यह नैतिक इरादों को एक लागू होने वाले सामाजिक अनुशासन में बदल देता है, जिससे सुधारों को दीर्घायु मिलती है। टोरू के इस प्रयोग को जो बात सबसे ज्यादा प्रभावशाली बनाती है, वह है इसका ‘स्केलेबिलिटी’, यानी बड़े स्तर पर लागू होने की क्षमता। इन सुधारों के लिए किसी वित्तीय बजट, विधायी समर्थन या प्रशासनिक मशीनरी की आवश्यकता नहीं है। ये पूरी तरह से आपसी सहमति, नैतिक साहस और सामूहिक जवाबदेही पर टिके हैं।
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यदि सरकारी संस्थानों से इन्हें मान्यता और प्रोत्साहन मिले, तो ऐसे मॉडलों को पूरे हिमाचल और उससे आगे भी लागू किया जा सकता है और यह वहां भी सफल हो सकते हैं, जहां ऊपर से थोपे गए सामाजिक सुधार अक्सर विफल हो जाते हैं। टोरू का अनुभव हमें याद दिलाता है कि स्थायी सामाजिक सुधार न तो केवल कानूनों से पैदा होते हैं और न ही नीतिगत निर्देशों से। इसकी शुरुआत तब होती है, जब समुदाय अपनी स्वयं की प्रथाओं पर सवाल उठाने का साहस जुटाते हैं। यदि टोरू का यह संकल्प अडिग रहता है, तो इसे एक ऐसी मिसाल के रूप में देखा जाएगा, जिसने दिखाया कि समाज या गांव जब चाहे, तब राज्य (सत्ता) को भी परिवर्तन की दिशा दिखा सकता है।
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