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संस्कृति के पन्नों से: शिव-पत्नी उमा कैसे बनीं गौरी? सौ वर्षों की कठोर तपस्या के बाद मिला वर

Sun, 01 Mar 2026 08:47 AM IST
Pavan आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक

सार

सौ वर्षों की कठोर तपस्या के बाद वर पाकर पार्वती जी का रूप उज्ज्वल गौरी का हो गया। फिर उन्होंने विंध्याचल में निवास कर ‘विंध्यवासिनी’ नाम पाया। अंततः उमा गौरी रूप में पुनः शिव की सेवा में लीन हो गईं।
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शिव-पत्नी उमा कैसे बनीं गौरी? - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमालय और मैना की तीन कन्याएं थीं। उनमें सबसे छोटी पुत्री का नाम काली था। दोनों बड़ी बहनें तपस्या करने गईं, तो काली भी तपस्या के लिए निकलने लगीं। यह देखकर माता मैना ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘उ मा’, अर्थात ‘मत जाओ।’ मां के इस वचन के कारण ही काली का नाम आगे चलकर ‘उमा’ पड़ गया, परंतु उमा ने तपस्या का मार्ग नहीं छोड़ा। वह भोलेनाथ को पति रूप में पाना चाहती थीं।
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उमा, हिमालय पर घोर तप में लीन हो गईं। ब्रह्मा जी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए देवताओं को भेजा, परंतु उमा का तेज असह्य होने के कारण देवमंडल उनके निकट जाने का साहस भी न कर सका। सभी देवता लौटकर ब्रह्मा जी के पास आ गए। तब ब्रह्मा जी ने कहा, ‘अब तारकासुर और महिषासुर का अंत निश्चित है।’ यह सुनकर देवता निश्चिंत होकर अपने-अपने लोक चले गए। उधर अपनी प्रियतमा सती के वियोग से संतप्त भगवान शंकर भ्रमण करते हुए हिमालय पहुंचे। पर्वतराज हिमालय ने उनका आदर-सत्कार किया और प्रार्थना की कि शिवजी यहीं निवास करें। उन्होंने यह स्वीकार कर लिया और हिमालय में आश्रम बनाकर रहने लगे।

एक दिन गिरिराजकुमारी काली शिवजी के आश्रम पहुंचीं। उन्हें देखते ही भोलेनाथ समझ गए कि सती ने पुनः जन्म लिया है। उमा ने सखियों सहित उनके चरणों में प्रणाम किया। बहुत देर बाद शंकर जी ने नेत्र खोले और कहा, ‘यह कौन है?’ इतना कहकर वह गणों सहित अंतर्धान हो गए। यह सुनकर उमा का हृदय दुख से भर गया। उन्होंने पिता हिमालय से कहा कि वह शंकर जी को पति रूप में पाने के लिए घने वन में जाकर कठोर तपस्या करेंगी। हिमालय ने अनुमति दे दी और उमा वन में चली गईं।
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एक दिन एक वटुक के रूप में स्वयं शंकर जी उनकी परीक्षा लेने आए। वटुक ने बताया कि वह वाराणसी से प्रयाग की यात्रा पर निकले हैं। तब पार्वती जी की सखी सौभाग्यवती ने बताया कि उमा शंकर को पति रूप में पाने के लिए तप कर रही हैं। यह सुनकर वटुक ने शंकर की निंदा की। इससे पार्वती क्रुद्ध हो गईं और सखी से इस निंदक को रोकने को कहा। तभी वटुक मूर्छित हो गया और उसी क्षण शंकर जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए। शंकर जी ने पार्वती जी से कहा, ‘तुम्हारे द्वारा पूजित यह युगल रूप ‘विश्वेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध होगा और इसके पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।’

इसके बाद माता पार्वती हिमालय के घर लौट आईं और विधिपूर्वक पुनः तपस्या करती रहीं। कुछ समय बाद शिवजी ने देवशक्तियों को हिमालय के पास भेजा। वे सभी वहां पहुंचे और हिमालय को बताया कि भगवान शंकर उनकी पुत्री काली को अर्धांगिनी बनाने आ रहे हैं। यह सुनकर मां मैना ने कहा कि इसी कन्या से उत्पन्न पुत्र ही दैत्यों का नाश करेगा। शुभ मुहूर्त देखकर महादेव देवों और गणों की बारात लेकर पहुंचे। ढोल-नगाड़ों और वैदिक विधियों के साथ शंकर और पार्वती जी का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद शंकर जी मां काली के साथ रमण के लिए कैलास गए।

एक अवसर पर शंकर जी ने पार्वती जी को ‘काली’ कह दिया। इससे माता पार्वती को दुख हुआ। वह गौरी रूप प्राप्त करने के लिए शंकर जी की अनुमति लेकर पुनः हिमालय में तपस्या करने चली गईं। वहां उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया। उसी समय एक व्याघ्र उनके सामने आकर बैठ गया, पर पार्वती जी अडिग रहीं। सौ वर्ष पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि तुम अजेय रहोगी, धर्मपरायण बनोगी और महादेव में तुम्हारी अचल भक्ति होगी। 

वर पाकर पार्वती जी ने अपने काले तेजस्वी कोष का परित्याग किया और उनका रूप उज्ज्वल गौरी का हो गया। उस त्यागे गए कोष से कौशिकी देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने विंध्याचल में निवास कर ‘विंध्यवासिनी’ नाम पाया। अंततः उमा गौरी रूप में पुनः कैलास पहुंचकर सदाशिव की सेवा में लीन हो गईं।
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