विक्रम साराभाई-सतीश धवन
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एक साथ 104 सैटेलाइट लॉन्च किए
2017 में इसरो ने एक रिकॉर्ड बनाया। इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाइट्स लॉन्च किए। यह भारत ही नहीं विश्व के लिए महत्वपूर्ण था। इसरो ने इतिहास रचा था क्योंकि अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत ने रूस का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। इससे पहले एक साथ किसी अभियान में सबसे ज्यादा उपग्रह भेजने का रिकॉर्ड रूस के पास था। रूस ने यह काम 2014 में किया था जब एक साथ 37 उपग्रह भेजे गए थे।
दिलचस्प बात यह थी कि भारत ने दूसरे देशों के सैटेलाइट्स भी भेजे थे। भारत के अपने सैटेलाइट इस अभियान में सिर्फ 3 थे। जबकि दूसरे मुल्कों जिसमें इजराइल, कजाकिस्तान, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और अमेरिका के थे।
इनकी संख्या 101 थी। इस अभियान ने साफ किया कि भारत अंतरिक्ष विज्ञान के कॉमर्शियल इस्तेमाल में सक्षम है। भारत ने इस अभियान से साबित किया कि सैटेलाइट प्रक्षेपण के बाजार में अभारत की अब महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी भारत ने 21 देशों के 79 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया था। इसमें गूगल और एयरबस के सैटेलाइट भी शामिल थे।
सस्ता प्रक्षेपण, चीन से मुकाबला
इसरो ने प्रक्षेपण के बाजार में अपनी हिस्सेदारी इसलिए मजबूत की है कि इसरो दुनिया के बाकी मुल्कों के मुकाबले सस्ता प्रक्षेपण उपलब्ध करवाता है। इसका एक मुख्य कारण इसरो द्वारा सस्ता श्रम उपलब्ध करवाना है। हालांकि भारत को इस दिशा में अब चीन से चुनौती मिल रही है, क्योंकि चीन भी अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सस्ती सुविधा उपलब्ध करवा रहा है।
भारत अंतरिक्ष विज्ञान में चीन का मुकाबला तभी कर पाएगा जब-जब बड़े सैटेलाइट को प्रक्षेपित करेगा, क्योंकि अभी भी अंतरिक्ष के कमर्शियल बाजार में छोटे सैटेलाइटों की हिस्सेदारी कम है, बड़ों की ज्यादा है। वहीं चीन अपने अंतरिक्ष विज्ञान पर बजट भारत से ज्यादा रखे हुए है।
दरअसल, अगर भारत और चीन की तुलना करें तो इस समय चीन एक साल में 20 सैटेलाइट अभियान लॉन्च करने की क्षमता रखता है, जबकि भारत 5 सैटेलाइट अभियान लॉन्च करने की क्षमता रखता है। हालांकि इसरो अपने अभियान लॉन्च करने की क्षमता को प्रतिवर्ष 12 तक ले जाने की योजना बना रहा है। इसमें जल्द ही इसरो को सफलता भी मिलने की उम्मीद है। हालांकि भारत अभी भी हल्के औऱ छोटे विदेशी सैटेलाइट भेज रहा है, जिससे कमाई कम है।
चंद्रयान-2, भारत का मिशन चांद
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इसरो और पंडित नेहरू को लेकर विवाद
इसरो लगातार कामयाबी पर कामयाबी हासिल करता जा रहा है। लेकिन इसरो की इन कामयाबी के बीच राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं। आरोप-प्रत्योराप के दौर लगातार चले हैं। मार्च 2019 में भारत के एंटी सैटेलाइट परीक्षण में अभूतपूर्व सफलता के बाद फिर सोशल मीडिया पर इसरो को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
कांग्रेस विरोधी विचारों के लोगों ने सोशल मीडिया पर हमला बोलते हुए कहा कि पंडित नेहरू का इसरो की स्थापना में कोई योगदान नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि इसरो की सथापना नेहरू के देहांत के पांच साल बाद हुई। जबकि कांग्रेस के लोग लगातार इसरो को पंडित जवाहर लाल नेहरू की उपलब्धि बताते रहे हैं।
कांग्रेस का तर्क रहा है कि पंडित नेहरू के विज्ञान प्रेम ने इसरो की स्थापना का रास्ता साफ किया। जबकि पंडित नेहरू और कांग्रेस के विरोधियों का तर्क रहा है कि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल हुई है, उसका श्रेय कांग्रेस को नहीं दिया जा सकता है। कई सोशल वेबसाइट पर चला यह विवाद अभी भी चलता रहता है, जिसमें नेहरू का जिक्र बार-बार आता है। हालांकि यह सच्चाई है कि इसरो की स्थापना पंडित नेहरू के देहांत के 5 साल बाद हुई थी।
इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इसरो को बनाए जाने की की नींव पंडित नेहरू ने अपने जीते जी रख दी थी। पंडित नेहरू ने इंडियन नेशनल कमेटी फॉर रिसर्च नामक इकाई का गठन कर दिया था जिसका नेतृत्व प्रसिद वैज्ञानिक विक्रम साराभाई कर रहे थे।
नेहरू ने इस इकाई का गठन अपने मृत्यु से दो साल पहले लिया था। इसरो की आधिकारिक वेबसाइट पर इसकी जानकारी देते हुए बताया गया है कि भारत ने अंतरिक्ष में जाने का फैसला 1962 में तब किया था जब इंडियन नेशनल कमेटी फॉर रिसर्च की स्थापना की गई थी। हालांकि यह एक दूसरी सच्चाई भी है कि 1969 में ही जब इसरो की स्थापना हुई तो उस समय देश की प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल की बेटी इंदिरा गांधी ही थी।
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