आपातकाल 21 महीने तक रहा। आपातकाल लगाने के पीछे इलाहाबाद कोर्ट के उस फैसले को कारण माना जाता है।
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21 माह का भयावह दौर और भारत की सियासत
आपातकाल 21 महीने तक रहा। इस अवधि में देश की स्थिति काफी भयावह हो गई। भारतीय कानून और संविधान में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के अधिकार सीमित कर दिए गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रवादी गतिविधियों से भयभीत होकर 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया, क्योंकि, 25 जून से पूर्व ही श्रीमती गांधी की मंशा का अंदाजा लगाते हुए आपातकाल के खिलाफ जनजागृति प्रसारित करने में लग गई थी।
15 मार्च को नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान ने संविधान में आपातकाल और लोकतंत्र विषय पर एक परिचर्चा की मेजबानी की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बाराव ने कहा कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जब राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए मिल जाएं।
आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल लगभग डेढ़ लाख में से करीब एक लाख और मीसा में गिरफ्तार लगभग तीस हजार लोगों में से करीब पचीस हजार संघ परिवार के कार्यकर्ता ही थे। आंदोलन के दौरान लगभग 110 स्वयंसेवक अपनी जान से हाथ धो बैठे। लोक संघर्ष समिति के जरिए आपातकाल के विरोध में निरंतर आंदोलन चलाया गया। कहा जाता है कि इसके गठन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महती भूमिका थी।
अपनी गिरफ्तारी के पूर्व जयप्रकाश नारायण ने नाना जी देशमुख को लोक संघर्ष समिति की बागडोर सौंप दी और जब नानाजी देशमुख को गिरफ्तार किया गया, तो सर्वसम्मति से सुंदर सिंह भंडारी को नेतृत्व सौंपा गया।
इधर, जिस तरह से राष्ट्रहित एवं लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे जोश एवं ईमानदारी के साथ लगी, उसे देखकर साम्यवादी नेताओं को भी अब उनकी प्रशंसा करने के लिए बाध्य होना पड़ा।
9 जून 1979 के इंडियन एक्सप्रेस के अंक में मार्क्सवादी सांसद एके गोपालन ने लिखा-
“इस तरह के वीरतापूर्ण कृत्य और बलिदान के लिए उन्हें अदम्य साहस देने वाला कोई आदर्श ही होना चाहिए”।
यद्यपि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का विरोध किया और आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया, पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का समर्थन किया। उन्होंने इसे एक अवसर के रूप में देखा और उसका स्वागत किया। उनका मानना था कि वह आपातकाल को कम्युनिस्ट क्रांति में बदल सकते हैं, वैसे भी वामपंथी ऐसी सभी गतिविधियों का समर्थन करते हैं जिसके चलते अराजकता फैलती है और स्थापित व्यवस्था को उखाड़ा जा सकता हो।
भाकपा ने अपने राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान आपातकाल के समर्थन में प्रस्ताव भी पारित किया। इसका असर हुआ कि उसके सभी कार्यकर्ता कांग्रेस के आपातकाल के समर्थन में पूरे देश में सक्रिय हो गए और सरकार का समर्थन करने लगे।
यह इंदिरा गांधी के लिए बहुत बड़ा नैतिक समर्थन था और इसकी कीमत बाद के दिनों में उन्होंने उन्हें अदा किया। एक योजना के तहत सारे बौद्धिक संस्थान धीरे-धीरे वामपंथियों को सुपुर्द कर दिए गए। इसका परिणाम हमें आज देखने को मिलता है। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण, मधु लिमये, चंद्रशेखर, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह के साथ जनसंघ के अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, ध्रुवचंद बंसल, प्रभु दयाल मित्तल सहित अनेक प्रमुख नेताओं को जेल में बंद किया गया।
अटल जी की जेल में तबीयत खराब हो गई, तो उन्हें एम्स में शिफ्ट करना पड़ा। हालांकि गिरफ्तारी के दौरान अटल जी कई बार बीमार पड़े। वे 18 माह जेल में रहे और इस दौरान जेल में लिखी अपनी कविताओं से लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। वाजपेयी देश में हो रहे भूमिगत आंदोलनों से अवगत होते रहते थे। आपातकाल के अत्याचार से पीड़ित होकर उन्होंने एक कविता लिखी थी, जो काफी लोकप्रिय हुई थी।
अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून
भंग कर दिया संघ को कैसा चढ़ा जुनून
कैसा चढ़ा जुनून मातृ पूजा प्रतिबंधित
कुटिल कर रहे केशव-कुल की कृती कलंकित
कहे कैदी कविराय तोड़ कानूनी कारा
गूंजेगा भारत माता की जय का नारा
आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल लगभग डेढ़ लाख में से करीब एक लाख और मीसा में गिरफ्तार लगभग तीस हजार लोगों में से करीब पचीस हजार संघ परिवार के कार्यकर्ता ही थे।
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मौजूदा महागठबंधन के अधिकतर नेता कांग्रेस विरोध की मिट्टी की उपज
आज कांग्रेस के साथ राजनीतिक पारी खेलने को आतुर एवं उनके साथ महागठबंधन में शामिल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन दिनों छात्र नेता थे और जेपी आंदोलन का हिस्सा थे। उस दौरान बड़े नेताओं के साथ नीतीश जी भी इनामी अपराधियों की सूची में शामिल थे। 9 जून 1976 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार करने वाले पुलिस को 2750 रुपये की राशि का पुरस्कार दिया गया।
कहा जाता है कि नीतीश कुमार की कनपटी पर बंदूक रखकर उन्हें हथकड़ी पहनाई गई थी।
कायदे से कहा जाए तो महागठबंधन में शामिल लगभग सभी दल (कांग्रेस को छोड़कर) कांग्रेस विरोध की मिट्टी से उत्पन्न हुए हैं। यह राजनीतिक विद्रूपता ही कही जाएगी कि आज सभी एकजुट होकर उन लोगों के खिलाफ एक मंच पर आना चाह रहे हैं, जिन्होंने आपातकाल के दौरान जब लोकतंत्र की हत्या हो रही थी, उनके कंधे से कंधा मिलाकर आपातकाल के विरोध में अपने खून बहाये थे।
सर्वविदित है कि आपातकाल के दौरान सभी नागरिक अधिकार निरस्त कर दिए गए थे। सत्ता के खिलाफ बोलना अपराध हो गया था। जो लोग सत्ता के खिलाफ बोलते थे, उन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता था। कुल मिलाकर आपातकाल के दौरान ऐसा अत्याचार किया गया, जिसने देशवासियों को एक बार फिर से अंग्रेजों के शासन की याद दिला दी। देश ने उन दिनों जबरन नसबंदी का दौर भी देखा।
डाइनिंग टेबल पर हेड की कुर्सी को लेकर संजय गांधी ने नेवी चीफ की बेइज्जती कर दी। प्रेस को सेंसर कर दिया गया। अखबार वही खबर छाप सकते थे, जो सरकार चाहती थी। वैसे सभी खबर प्रतिबंधित कर दिए गए जिनसे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचता था।
भारतीय लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास में वंशवादी कांग्रेस के द्वारा थोपा गया आपातकाल एक काले धब्बे की तरह है, जिसे याद कर देशवासी आज भी सिहर जाते हैं। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। सभी देशवासियों का मन अपनी उपलब्धियों और विरासत को लेकर गौरव से भरा हुआ है। आज 46 साल के बाद भले ही देश के लोकतंत्र की एक गरिमामई तस्वीर सारी दुनिया में प्रशस्त हो रही हो, लेकिन आपातकाल के दंश का दर्द आज भी हमारे दिलों से नहीं गया है।
हिटलर के अत्याचारों के लिए जर्मनी ने माफी मांग ली, पर आज तक कांग्रेस के किसी नेता ने आपातकाल के लिए देश से क्षमा नहीं मांगी है, जो साबित करता है कि आज भी उनके मन में आपातकाल को लेकर किसी भी तरह का अपराधबोध नहीं है। निश्चित रूप से आपातकाल का दौर भारतीय लोकतंत्र का शर्मनाक और काला अध्याय है।
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