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आपातकाल एक काला अध्याय: कांग्रेस क्यों छिपा रही है अपने कुकृत्य?

सार

आपातकाल लगते ही देश से लोकतंत्र की मर्यादाएं रौंद दी गईं और मौलिक अधिकार छीन लिए गए। जिन नागरिकों ने सरकार का विरोध किया, उन्हें बिना दलील व अपील के जेल में डाला गया। इस सबका आधार बना इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक मुकदमा, जो 'राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश' के नाम से जाना गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में एक निर्णय दिया, जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतनी भयभीत हुईं कि देश पर कब्जा करने का प्रपंच रच डाला। 
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25 जून 1975 को इस देश में वो सब घटित हुआ, जिसकी कल्पना भी डरा देती है। - फोटो : PTI
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विस्तार
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अभिव्यक्ति की आज़ादी एक बहुचर्चित विषय है और 25 जून का दिन इस बारे में चिंतन करने का एक महत्वपूर्ण दिन है। 25 जून 1975 को इस देश में वो सब घटित हुआ, जिसकी कल्पना करना भी वीभत्स है। आपातकाल स्वार्थ के आगे लोकतंत्र को धराशायी करने का एकमात्र उदाहरण है। यह सब अचानक नहीं हुआ, बल्कि व्यक्तिपूजा की कांग्रेस की परिपाटी का ही परिणाम था, जिसके चलते 1974 में तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने 'इंदिरा ही इंडिया' और 'इंडिया ही इंदिरा जैसा' नारा दिया। 

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दरअसल, इस विचार के खिलाफ जो भी घटित होता, वो इंदिरा गांधी को असुरक्षित कर देता। इसी तानाशाही की विचारधारा ने आपातकाल को जन्म दिया। हालांकि, आज के परिवेश में कुछ तत्व अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में चर्चा करते हैं और दुर्भाग्य से ऐसी विचारधारा को लेकर चर्चा खड़ी करना चाहते हैं, जिसने 1975 में आज ही के दिन देश को आपातकाल के अंधकार में धकेल दिया था। इसका कारण था सत्ता छिन जाने का डर। 

न्यायालय व न्यायिक प्रक्रियाओं पर अंगुली उठाने वाली विचारधाराएं अचानक से भूल गईं कि एक समय सत्ता लोलुपता में देश के संविधान को उन्ही के द्वारा रौंदा जा चुका है, लेकिन आज के समय में एक नई प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया है। कांग्रेसी विचारधारा अपने इस कुकृत्य को आने वाली पीढ़ी से छिपाना चाहती है। इसके लिए दुष्प्रचार का सहारा लिया जा रहा है।

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आपातकाल लगते ही देश से लोकतंत्र की मर्यादाएं रौंद दी गईं और मौलिक अधिकार छीन लिए गए। - फोटो : फाइल फोटो

आपातकाल और मेरे अनुभव 
अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर व्यर्थ में सवाल खड़े किए जाते हैं और यह बताने का प्रयास होता है, जैसे देश में हालात सामान्य न हो। इस पर कांग्रेस का साथ वामपंथ और दूसरी समर्थित विचारधाराएं देती हैं, जिनका लक्ष्य एक झूठा परिप्रेक्ष्य तैयार करना है, लेकिन इस कालखंड का मेरा निजी अनुभव है।

आपातकाल लगते ही देश से लोकतंत्र की मर्यादाएं रौंद दी गईं और मौलिक अधिकार छीन लिए गए। जिन नागरिकों ने सरकार का विरोध किया, उन्हें बिना दलील व अपील के जेल में डाला गया। इस सबका आधार बना इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक मुकदमा, जो 'राज नारायण  बनाम उत्तर प्रदेश' के नाम से जाना गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में एक निर्णय दिया, जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतनी भयभीत हुईं कि देश पर कब्जे का प्रपंच रच डाला। 

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अलोकतांत्रिक निर्णय लिए। - फोटो : Social media

इमरजेंसी की काली स्मृतियां 
देश में पहले ही सरकार की मखालफत हो रही थी और बिहार में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन चरम पर था, लेकिन इस मामले में जस्टिस सिन्हा ने अपने निर्णय में न केवल इंदिरा गांधी के लिए रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया, बल्कि अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक भी लगा दी।  

ऐसे में इंदिरा गांधी न लोकसभा की सदस्य रहीं, न ही राज्यसभा जा सकती थीं। सारे विकल्प तलाशने के बाद कांग्रेस की सरकार ने तय किया कि देश को आपातकाल के अंधकार में झोंक दिया जाए। आज शोर मचाने वाली विचारधारा ने उस समय अभिव्यक्ति के सभी मंचों पर प्रतिबंध लगाने का काम किया। सभी यातनाओं, षड्यंत्रों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व आनुषांगिक संगठनों का भूमिगत गतिविधियां जारी रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिस मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार को घेरने का कुत्सित प्रयास कांग्रेस व समर्थित विचारधारा द्वारा किया जा रहा है, उसी मीडिया को तालाबंद कर दिया गया था।  

देशभर में हुए अत्याचार की कहानी शाह कमीशन की रिपोर्ट बयान करती है, लेकिन कांग्रेस की विचारधारा अपने उस कुकृत्य पर चुप है और देश में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कर रही है, जिससे उनका दुष्कार्य जनता भूल जाए। हम सबने अंग्रेजों के शासनकाल के रोलेट एक्ट, जिसे काला कानून भी कहा जाता है, के बारे में सुना था, मगर आपातकाल का कालखंड निश्चित रूप से उससे भी भयावह था।

(नोट: लेखक हिमाचल प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री हैं, जो स्वयं आपातकाल के समय जेल गए थे।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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