डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
सरदार सरोवर बांध परियोजना सबसे बडी और विवादास्पद परियोजना रही है, जिसने 2.50 लाख से अधिक लोगों को बेघर कर दिया और विशाल सिंचित भूमि को मध्य प्रदेश में नुकसान पहुंचाया है। हां, गुजरात को काफी हद तक लाभ मिला। अस्थिरता से भरे इन चार दशकों के दौरान, 'एनबीए' आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मुख्य रूप से मेधा पाटकर के नेतृत्व में, 'एनबीए' ने सबसे पहले बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी।
एक तरफ जहां शक्तिशाली और परमाणु बम संपन्न देशों के बीच अपने ‘अधिकारों’ के लिए तनाव और संघर्ष वैश्विक पटल पर छाया हुआ है, वहीं भारत के कुछ हिस्सों में गरीब आदिवासी और किसान बुनियादी आजीविका के अधिकारों के लिए अपार कष्ट झेल रहे हैं, जो बड़ी विकास परियोजनाओं का नतीजा है। स्वतंत्र भारत में न्याय के लिए सबसे प्रभावी जनसंघर्षों में से एक नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) ने गुजरात की सरदार सरोवर बांध परियोजना (एसएसपी) के खिलाफ चली आ रही अपनी लंबी और अनवरत व शांतिपूर्ण लड़ाई के सफल 40 साल पूरे कर लिए हैं।
सरदार सरोवर बांध परियोजना सबसे बडी और विवादास्पद परियोजना रही है, जिसने 2.50 लाख से अधिक लोगों को बेघर कर दिया और विशाल सिंचित भूमि को मध्य प्रदेश में नुकसान पहुंचाया है। हां, गुजरात को काफी हद तक लाभ मिला। अस्थिरता से भरे इन चार दशकों के दौरान, 'एनबीए' आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मुख्य रूप से मेधा पाटकर के नेतृत्व में, 'एनबीए' ने सबसे पहले बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी, और फिर परियोजना से विस्थापित हुए हजारों लोगों के कानूनी अधिकारों के लिए जंग अब भी जारी है। आंदोलन ने कई हजार परिवारों को पुनर्स्थापित भी किया। अपने संघर्ष के पहले 25 वर्षों में मेधा को पर्याप्त सामाजिक और राजनीतिक समर्थन हासिल हुआ था, लेकिन अंततः वे खुद को आज अकेला पाती हैं क्यों की समस्याओं का पूरा समाधान नहीं हुआ है।
जाहिर है इस वजह से मेधा के अंदर शायद तंत्र के प्रति कड़वाहट भर गई है, हालांकि वह इसे अपने चेहरे पर कभी नहीं दिखाती। अथक परिश्रमी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा अभी भी नर्मदा घाटी में रहने वाले सीमांत किसानों, गरीबों और अशिक्षित आदिवासियों के लिए संघर्षरत है जो बेहद सराहनीय है। उनकी जिजीविषा को सलाम।
मेधा का कहना है कि अब नर्मदा नदी को ही बचाने का समय आ गया है क्योंकि इसका पानी प्रदूषित हो रहा है और पीने योग्य नहीं रह गया है।
पाटकर बड़े बांधों की उपयोगिता, उनकी लागत और लाभों पर सवाल उठाती रहती हैं। वह उन लोगों की भयावह स्थिति को उजागर करती हैं जिन्हें मजबूरन अपने पुश्तैनी घर और कृषि भूमि को छोड़ना पड़ा और राज्य के बाहर बंजर जमीन के टुकड़ों पर बसना पड़ा, अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल होने की असीम पीड़ा के बारे में तो बात ही छोड़िए, आदिवासीयों आंखों के अथाह आंसू सब बयान कर है।
चालीस वर्ष बाद, 'एनबीए' भले ही उतना मजबूत संगठन न बचा हो , मेधा का जज्बा अदम्य है. वह आदिवासियों और कमजोर वर्ग के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए अपनी आवाज दमदारी से उठा रही है। यह सब भी ऐसे कठिन समय में जब विरोध करना पाप-सा है, कुछ कम नहीं है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।