पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा के चुनावी इतिहास के सबसे अहम विधानसभा चुनाव की तैयारियां लगभग पूरी हो गई हैं। विधानसभा की महज 60 सीटें होने के बावजूद इस राज्य ने इस बार जितनी सुर्खियां बटोरी हैं उतनी शायद कभी नहीं बटोरी थी। इसकी प्रमुख वजह है कांग्रेस-वाम गठबंधन और क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा के उभार के कारण भाजपा का सत्ता बचाने के लिए जूझना।
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो भाजपा ने यहां 55 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। सरकार में उसकी सहयोगी इंडीजीनस पीपुल्स पार्टी आफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) छह सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इन दोनों सहयोगियों में एक सीट पर दोस्ताना मुकाबले की संभावना है। दूसरी ओर, वामपंथी पार्टियां 47 और उसकी सहयोगी कांग्रेस 13 सीटों पर लड़ रही है। टिपरा मोथा ने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। भाजपा ने सबसे ज्यादा 12 महिलाओं को टिकट दिया है।
भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए दो चिर प्रतिद्वंदियों यानी कांग्रेस और वाम मोर्चा ने हाथ मिला लिया है और इस गठजोड़ से भगवा खेमे में आशंकाएं भी बढ़ गई हैं। यह गठजोड़ इसमें शामिल दोनों दलों यानी वाममोर्चा और कांग्रेस के लिए समान रूप से अहम है। यहां लंबे अरसे तक राज करने वाली सीपीएम अबकी कांग्रेस को साथ लेकर भाजपा विरोधी वोटों में बिखराव रोकने की कवायद में जुटी है।
दूसरी ओर, कांग्रेस भी यहां वजूद की लड़ाई लड़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महज भाजपा नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के विरोध ने भी इन दोनों के एकजुट होने में अहम भूमिका निभाई है। हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस खासकर त्रिपुरा और मेघालय में कांग्रेस के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर उभरी है। इन दोनों राज्यों में उसने कांग्रेस का लगभग सफाया कर दिया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस तालमेल से क्या दोनों दलों के वोटर भी एक साथ हो सकेंगे? करीब सात दशकों से कांग्रेस और वाममोर्चा यहां परस्पर विरोधी रहे हैं। वर्ष 2018 में वाम विरोधी ज्यादातर वोट भगवा खेमे में चले गए थे।
शाही घराने के उत्तराधिकारी प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मन ने मुकाबले को तिकोना बना दिया है। एक ओर, सत्ता में वापसी के जी तोड़ कोशिश कर रही भाजपा है तो दूसरी ओर अबकी सत्ता के सपने देख रहा वाम-कांग्रेस गठबंधन है। लेकिन राजनीतिक हलकों में धारणा बन रही है कि अबकी प्रद्योत की क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा किंगमेकर साबित हो सकती है।
टिपरा मोथा ने राज्य की 60 सीटों में से 42 पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। उसने अपने चुनाव घोषणापत्र में राज्य के मूल निवासियों के लिए ग्रेटर टिपरालैंड नामक अलग राज्य का वादा किया है। पार्टी ने आदिवासी परिषद के लिए अलग पुलिस बल गठित करने, 20 हजार नई नौकरियां पैदा करने और हथियार डालने वाले उग्रवादियों के लिए एकमुश्त पैकेज का भी एलान किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि खासकर अगर बांग्लाभाषी बहुल इलाकों में वाम और कांग्रेस के वोट एकजुट हो गए और आदिवासी इलाकों में टिपरा मोथा ने बेहतर प्रदर्शन किया तो भाजपा के लिए संकट पैदा हो सकता है। आदिवासी इलाकों की 20 सीटों पर टिपरा मोथा वह बेहद मजबूत नजर आती है।
भाजपा भी कांग्रेस-वाम गठबंधन और टिपरा मोथा की ओर से मिल रही चुनौतियों से वाकिफ है। लेकिन उसे अपने काम से ज्यादा विपक्षी वोटों में विभाजन पर भरोसा है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री समेत कई दिग्गज नेताओं के ताबड़तोड़ दौरे और विपक्ष पर तीखे हमलों से उसकी चिंता साफ झलकती है। वर्ष 2018 के चुनाव में वाममोर्चा को 42.22 और भाजपा को 43.59 फीसदी वोट मिले थे। कई सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत का अंतर बहुत कम था। कांग्रेस-वाम गठबंधन ऐसी सीटों पर समीकरण गड़बड़ा सकता है। और मतदान से ठीक पहले इसी आशंका ने भाजपा की नींद छीन ली है।
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