सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अब्दुल नजीर
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जस्टिस नजीर और राम जन्मभूमि फैसला
जस्टिस नजीर के संदर्भ में यह सवाल शिद्दत से इसलिए उठ रहा है, क्योंकि राम जन्मभूमि मामले में फैसला देने वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ में से तीन जजों का पुनर्वास मोदी सरकार ने कर दिया है। उन पांच जजों में से एक तो अभी देश के प्रधान न्यायाधीश हैं ही। राम जन्मभूमि मामले में ऐतिहासिक फैसला देने वाली संविधान पीठ के अध्याक्ष रहे तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को सरकार ने पद से रिटायर होते ही तुरंत राज्यसभा का सदस्य नामित कर दिया।
जस्टिस गोगोई ने कई ऐसे फैसले दिए, जिनमें सरकार के पक्ष को उचित माना गया। मसलन उन्होंने रफाल सौदे की समीक्षा और राहुल गांधी के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामलों की भी सुनवाई की। रफाल सौदे में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे लेकिन रंजन गोगोई की बेंच ने रफाल सौदे की जांच को लेकर दायर की गई सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इनके अलावा जस्टिस रंजन गोगोई ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रद्द किए जाने के बाद दायर सभी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को भी खारिज कर दिया था।
इसके पहले भारत के 21वें चीफ जस्टिस रहे रंगनाथ मिश्रा को कांग्रेस पार्टी ने साल 1998 में राज्यसभा भेजा था। जस्टिस रंगनाथ मिश्र राज्यसभा जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जज थे। उनसे पहले जस्टिस बहारुल इस्लाम जनवरी 1983 में सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर हुए थे और उसी साल जून में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया था।
जजों की राजनीतिक पदों पर नियुक्ति पर संवैधानिक रोक नहीं
जस्टिस गोगोई के बाद राम जन्मभूमि मामले में संविधान पीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस अशोक भूषण को नेशनल कंपनी लाॅ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनक्लेट) का चेयरमैन बना दिया और अब जस्टिस नजीर आंध्र के राज्यपाल बन गए हैं। वैसे पूर्व जजों को राजनीतिक पदों पर नियुक्त करने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 124(7) सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले जजों को केवल न्यायपालिका के क्षेत्र में कोई पद लेने से रोकता है। सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होने के बाद किसी अदालत में वकालत भी नहीं कर सकते हैं। साल 1958 में अपनी चौदहवीं रिपोर्ट में भारत के विधि आयोग ने जजों के रिटायर होने के बाद सरकारी पद लेने पर रोक की सिफ़ारिश की थी, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पूर्व जजों की राजनीतिक नियुक्तियों पर एक सुझाव पूर्व जस्टिस आरएम लोढ़ा ने यह दिया था कि रिटायर होने के बाद जजों के लिए दो साल का ‘कूलिंग ऑफ’ पीरियड होना चाहिए। यानी इस अवधि के समाप्त होने से पहले जज कोई पद स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2014 में इस सुझाव को खारिज कर दिया था।
एक तर्क यह भी है कि क्या जजों को दूसरी जिम्मेदारियों से केवल इसलिए दूर रखा जाना चाहिए कि वो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज रहे हैं? क्या इससे उनके अपने अधिकारों की अनदेखी नहीं होती? क्या किसी जज को मरते दम तक निष्पक्ष रहना ही साबित करना पड़ेगा? क्या वह न्यायाधीश रहने के मानसिक बोझ से कभी मुक्त नहीं हो सकता? क्या वह भी एक सामाजिक जीव नहीं है?
इन पेचीदा सवालों के जवाब भी जटिल ही हैं। लेकिन यहां असली सवाल यह है कि यदि पूर्व जज सरकार के लाभकारी राजनीतिक पदों को स्वीकार करते हैं तो उसका जनता में क्या संदेश जाता है? क्या यह कि जज ने जो फैसले दिए, वो किसी प्रतिदान की अपेक्षा में थे अथवा पूर्णत: न्यायिक मूल्यों के अनुरूप और निजी आग्रह दुराग्रहों से परे थे?
वैसे जज खुद चाहें तो सरकार द्वारा राजनीतिक पदों की पेशकश ठुकरा कर उच्च न्यायिक और नैतिक मानदंड कायम कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए नैतिक साहस और प्रतिबद्धता चाहिए। ऐसा नैतिक साहस अभी तक तो किसी पूर्व जज ने नहीं दिखाया है। हालांकि ऐसा करने से उस जज के फैसलों की निष्पक्षता और प्रामाणिकता ही पुष्ट होती।
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