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वेस्ट यूपी के चुनावी चक्रव्यूह में 7 दिग्गज

Wed, 08 Feb 2017 01:28 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ

सार

मेरठ जिले में किठौर, शहर और सरधना सीट पर है पूरे वेस्ट यूपी की नजर, पलायन प्रकरण में सुर्खियों में रही कैराना के अलावा थानाभवन भी चर्चा में, दंगों की चपेट में आई मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना सीट पर टिकीं सभी की निगाहें, रालोद का गढ़ मानी जाने वाली बागपत की छपरौली सीट को लेकर भी उत्सुकता
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विस्तार
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17वीं विधानसभा के पहले चरण के चुनाव के लिए प्रत्याशियों की तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है। इसके साथ ही प्रत्याशियों ने रूठों को मनाने और विपक्षियों की रणनीति को भेदकर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए दिन-रात एक कर दी है। वेस्ट यूपी की जनता की बात करें तो मेरठ जिले की तीन सीटों पर सभी की नजर है। इनमें किठौर, शहर और सरधना विधानसभा सीटें शामिल हैं। इसी तरह वर्ष-2013 के दंगों में हिंसा की आग में झुलसी मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना सीट के समीकरणों पर भी सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। इसके अलावा पलायन के मुद्दे को लेकर चर्चा में आई शामली जिले की कैराना के साथ थानाभवन तो रालोद का गढ़ मानी जाने वाली बागपत की छपरौली सीट को लेकर भी लोगों में उत्सुकता है।
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सरधना : दोबारा ‘संगीत’ की धुन पर सबकी नजर

संगीत सोम
मेरठ में सरधना सीट वर्ष-2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के बाद चर्चा में आई। अब फिर से इस सीट पर सभी की नजरें लगी हैं। पिछली बार यहां से भाजपा से संगीत सोम जीते थे। इस बार वह फिर से चुनावी मैदान में हैं। इस सीट पर इस बार भी समीकरण पिछली बार से कुछ ज्यादा अलग नहीं हैं। प्रमुख प्रत्याशियों में चेहरे लगभग वही नजर आ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पिछली बार दो युवा तो दो पुराने धुरंधर मैदान में थे। इस बार पूरी तरह ही यूथ ब्रिगेड के बीच मुकाबला है। सपा के अतुल प्रधान फिर संगीत के सामने चुनाव में डटे हुए हैं, तो बसपा से मुस्लिम राजनीति में खासी पकड़ रखने वाले पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान कुरैशी मैदान में हैं। जबकि, रालोद ने भी यहां वकील चौधरी को मैदान में उतारकर मुस्लिम कार्ड खेला है। सरधना सीट पर सपा भले ही आज तक जीत हासिल न कर पाई हो, लेकिन अतुल प्रधान ने मुख्यमंत्री के करीबी होने के कारण क्षेत्र में पहचान बनाई है। ऐसे में इस चुनाव में मुस्लिम मतों के साथ ही अन्य बिरादरियों के मतदाताओं पर सबकी नजर होगी। वजह यह कि पिछले चुनाव में रालोद से चुनाव लड़े हाजी याकूब कुरैशी और सपा के अतुल प्रधान के बीच मुस्लिम मतों के बंटवारे के बीच संगीत सोम करीब 12 हजार वोटों से जीते थे। हालांकि, इस बार भी सपा और बसपा के साथ साथ रालोद के बीच मुस्लिम वोटों का बंटवारा क्या समीकरण उत्पन्न करता है, इस पर सभी की निगाह है।

मेरठ शहर ः वाजपेयी के लिए आसान नहीं चक्रव्यूह तोड़ना

लक्ष्मीकांत वाजपेयी
मेरठ शहर सीट पर इस बार भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सिटिंग विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। सपा ने यहां से पिछले चुनाव के ही लड़ाके रफीक अंसारी को मैदान में उतारा है तो बसपा ने पंकज जौली पर दांव खेला है। पिछले चुनाव पर नजर डालें तो सपा, कांग्रेस और बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। जबकि, भाजपा से अकेले डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी मैदान में थे। मुस्लिम वोटों के बंटवारे के बीच डॉ. वाजपेयी को इस सीट पर 6500 से ज्यादा मतों से जीत हासिल हुई थी। यह स्थिति तो तब बनी थी, जब प्रमुख पार्टियों के मुस्लिम प्रत्याशी यहां से अच्छे वोट ले गये थे। इस बार बसपा ने जहां पंजाबी कार्ड  खेला है तो रालोद ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर छात्र नेता रहे डॉ. ज्ञानेंद्र शर्मा को मैदान में  उतारा है। इससे वाजपेयी के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। जबकि, पिछले चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस और सपा के गठबंधन ने अकेले मुस्लिम प्रत्याशी के रूप में रफीक अंसारी को उतारकर लड़ाई तगड़ी कर दी है। रफीक पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे।

किठौर ः चौथी बार जीतने की चुनौती

शाहिद मंजूर
मेरठ में किठौर सीट मुस्लिम-गुर्जर बहुल मानी जाती है। अभी तक यहां से अधिकांश विधायक गुर्जर या मुस्लिम बिरादरी से ही निर्वाचित हुए हैं। सपा के शाहिद मंजूर लगातार तीन बार से विधायक हैं। अब उनके सामने चौथी बार चुनाव जीतने की चुनौती है। हालांकि, लोकसभा चुनाव के रण में भी वह उतरे थे पर मात खा गए। बावजूद इसके वह अपने समीकरण को काफी मजबूत मानकर चल रहे हैं। उनकी जीत में मुस्लिम मतों का बड़ा धड़ा उनके पक्ष में होने के साथ ही अन्य बिरादरियों में भी पकड़ मजबूत होना रहा है। उन्हें गुर्जर, जाट, त्यागी, ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, दलित आदि तमाम बिरादरियों से वोट मिलता रहा है। लेकिन, इस बार इन सभी को बांधना आसान नहीं नजर आ रहा। पिछले चुनाव में बसपा और भाजपा से जहां गुर्जर बिरादरी से दो प्रत्याशी मैदान में थे, तो एक त्यागी बिरादरी से। जबकि, मुस्लिम बिरादरी से वह अकेले मैदान में थे। इस बार बसपा से यहां अकेले गुर्जर प्रत्याशी गजराज नागर मैदान में हैं तो भाजपा से त्यागी बिरादरी के सत्यवीर त्यागी चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि, रालोद ने यहां किठौर नगर पंचायत के चेयरमैन मतलूब गौड़ को मैदान में उतारा है। ऐसे में मुस्लिम वोटों में भी कहीं न कहीं सेध लग रही है। गजराज जहां दलित गुर्जर वोटरों का अपना गणित लगा रहे हैं तो सत्यवीर त्यागी बिरादरी के अलावा ब्राह्मण, वैश्य और अन्य पर निगाह लगाए हुए हैं।
 
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कैरानाः घर में ही विरोध झेल रहे हुकुम सिंह

मृगांका सिंह
शामली में नामांकन तक प्रत्याशियों को लेकर बनी ऊहापोह की स्थिति अब साफ हो गई है। चुनावी मैदान में राजनीतिक दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अपनी सियासी विरासत को बचाने के लिए कड़ाके की सर्दी के बावजूद नेता पसीना बहा रहे हैं। कैराना में भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह पार्टी प्रत्याशी हैं। हुकुम सिंह को अपने घर में ही विरोध झेलना पड़ रहा है। उनके खानदान के ही अनिल चौहान बागी होकर रालोद में चले गए। रालोद ने उन्हें कैराना सीट से प्रत्याशी भी घोषित कर दिया। उधर, सपा ने इस सीट पर हसन परिवार के नाहिद हसन को चुनाव मैदान में उतारा है। वह 2014 के उपचुनाव में विधायक बने थे। उनका प्रयास रहेगा कि इस चुनाव में भी जीत दर्ज की जाए। थानाभवन सीट से भाजपा प्रत्याशी सुरेश राणा भी घिरे हुए हैं। इस सीट पर डॉ. सुधीर पंवार सपा प्रत्याशी हैं। सुरेश राणा का प्रयास रहेगा कि दोबारा वह विधानसभ की दहलीज पर दस्तक दें। 2012 के चुनाव में इसी सीट से सुरेश राणा विधायक बने थे। वहीं, बसपा ने अब्दुल वारिस को प्रत्याशी बनाया है तो रालोद ने भी मुसलिम चेहरे पर दांव खेलते हुए जावेद राव को मैदान में उतारा है। इस लिहाज से थानाभवन सीट पर भी मुकाबला कांटे का बन गया है।
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