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यूपी: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- फ्लैट का कब्जा लेने से खत्म नहीं होता देरी पर ब्याज का हक

Thu, 24 Sep 2026 11:13 PM IST
Akash Dwivedi अमर उजाला, लखनऊ

सार

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि फ्लैट का कब्जा स्वीकार करने से देरी पर ब्याज मांगने का अधिकार खत्म नहीं होता। अदालत ने नोएडा की परियोजना में तय समय से करीब पांच वर्ष बाद कब्जा देने पर खरीदार के पक्ष में ब्याज बरकरार रखा। डेवलपर की अपील भी खारिज कर दी।
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lawyer advocate and court - फोटो : adobestock
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विस्तार
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि फ्लैट का कब्जा स्वीकार करने मात्र से घर खरीदार का कब्जा मिलने में देरी के लिए ब्याज का दावा करने का वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम (आरईआरए) में विलंबित कब्जे के कारण ब्याज का दावा करने के लिए कोई विशिष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है।

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न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने नोएडा के सेक्टर 78 में स्थित अंतरिक्ष डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड की अंतरिक्ष गोल्फ व्यू परियोजना से संबंधित विवाद में दायर अपील को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। खरीदार श्याम सुंदर अग्रवाल ने 2010 में इस प्रोजेक्ट में एक फ्लैट बुक किया था, जिसका कब्ज़ा नवंबर 2012 तक मिलना था। हालांकि, डेवलपर ने मई 2017 में ही कब्ज़ा दिया और अदालत के अनुसार, उसने बिना कब्जा प्रमाण पत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के ऐसा किया।

आरईआरए अपीलीय न्यायाधिकरण ने डेवलपर को निर्देश दिया था कि वह अग्रवाल द्वारा दिसंबर 2012 से मई 2017 की अवधि के लिए जमा की गई राशि पर मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड बेस्ड लेंडिंग रेट से एक प्रतिशत अधिक की दर से ब्याज का भुगतान करे।
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डेवलपर ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि देरी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश के कारण हुई थी जिसमें ओखला पक्षी अभयारण्य के 10 किलोमीटर के दायरे में निर्माण और अधिभोग प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक लगाई गई थी।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि डेवलपर का स्वयं का मामला यह था कि परियोजना 2014 में पूरी हो गई थी और उसी वर्ष अधिभोग प्रमाण पत्र के लिए आवेदन भी किया गया था। इसलिए, वह एक साथ यह दावा नहीं कर सकता कि परियोजना पूरी हो चुकी है और एनजीटी के प्रतिबंध के कारण इसका पूरा होना रुका हुआ है।

कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त "शून्य अवधि" का लाभ केवल उस अवधि तक ही सीमित हो सकता है जिसके दौरान परियोजना वास्तव में प्रतिबंध से प्रभावित हुई थी और एनजीटी के आदेश से पहले हुई देरी को समाप्त नहीं कर सकता है। तदनुसार, अदालत ने विलंब अवधि के लिए ब्याज का भुगतान करने के निर्देश को बरकरार रखा और डेवलपर की अपील खारिज कर दी।
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