सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने कहा है कि कानून की पहुंच समाज में प्रत्येक व्यक्ति तक होनी चाहिए। कानून के समक्ष सभी बराबर हैं। अंतिम छोर पर बसे गरीब से गरीब व्यक्ति तक न्याय की पहुंच को सुनिश्चित बनाना बेशक चुनौतीपूर्ण है लेकिन अत्यावश्यक है।
यह बात शनिवार को न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएम खानविलकर ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में राज्य विविध सेवा प्राधिकरण द्वारा भारतीय संविधान के विभिन्न पहलु विषय पर आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कही। उन्होंने कहा कि न्याय बहुआयामी अवधारणा है।
अधिवक्ताओं पर इसकी समयबद्धता सुनिश्चित बनाने की जिम्मेवारी है। न्याय असमान को समान बनाता है। व्यक्ति कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, गलती के लिए सजा मिलनी चाहिए। थोड़ी भी ढील अथवा छूट न्याय प्रदान करने में बाधा उत्पन्न करती है। न्यायमूर्ति खानविलकर ने कहा कि न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय सर्वाधिक विश्वसनीय है तथा लोगों के पास आखिरी विकल्प भी।
लोगों की न्याय की उम्मीदों को पूरा करने पूरे संस्थान की जिम्मेवारी है। उन्होंने कहा कि आज के युग में भी 80 से 90 प्रतिशत लोग न्याय की पहुंच से बाहर हैं जो चिंताजनक है। इस दिशा में सूचना प्रौद्योगिकी का भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे न केवल पारदर्शिता आएगी बल्कि जिम्मेवारी भी निश्चित होगी।
उन्होंने कहा कि 10 से 15 प्रतिशत विवादों का समय पर ही निपटारा हो पाता है, शेष 80 प्रतिशत तक के मामलों में न्याय प्रदान करने में देरी से असंतोष की भावना पनपती है। न्यायालयों में बड़ी संख्या में लंबित मामले तथा अनावश्यक दस्तावेज न्यायिक प्रणाली को प्रभावित करते हैं।
न्याय के स्थानीय विकल्पों जैसे लोक अदालतों, सामाजिक समूहों व पंचायतों द्वारा समझौते इत्यादि को विशेष तरजीह प्रदान करनी चाहिए। इससे विवादों का निपटारा सस्ता व शीघ्र होता है। इस दौरान न्यायाधीश न्यायमूर्ति ने विधि विश्वविद्यालयों के
विद्यार्थियों की अनेक मुद्दों पर शंकाओं का समाधान भी किया। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय करोल ने प्राधिकरण द्वारा आम लोगों को प्रदान की जा रही सेवाओं की जानकारी दी। प्राधिकरण के सदस्य सचिव यशवंत सिंह चोगल ने धन्यवाद प्रस्तुत किया।
मीर ने बताए मौलिक अधिकार
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने कहा कि मौलिक अधिकारों में व्यक्ति को नागरिक स्वतंत्रता का अधिकार है। इसके अंतर्गत सभी नागरिक अपना जीवन शांति एवं सौहार्द ढंग से व्यतीत कर सकते हैं। कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति का अधिकार, धार्मिक एवं सांस्कृतिक आजादी निहित हैं। उन्होंने सभी मौलिक अधिकारों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के अनेक महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र भी किया तथा प्रसिद्ध न्यायविदों के उदाहरण प्रस्तुत किए।
ये गणमान्य भी रहे मौजूद
इस अवसर पर हिमाचल हाईकोर्ट के न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी, न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान, न्यायाधीश पीएस राणा, न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर, न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर, न्यायाधीश अजय मोहन गोयल, न्यायाधीश संदीप शर्मा, हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश डीपी सूद, आरके महाजन, केसी सूद, महाधिवक्ता श्रवण डोगरा, एडिशनल सालिसिटर जनरल आफ इंडिया अशोक शर्मा, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बीपी शर्मा, प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष न्यायाधीश वीके शर्मा, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. एससी रैना, एचपीयू के वाइस चांसलर प्रो. एडीएन वाजपेयी, रजिस्ट्रार जनरल राजीव भारद्वाज, रजिस्ट्रार अरविंद मल्होत्रा, वीरेंद्र शर्मा, रजिस्ट्रार जेके शर्मा, रजिस्ट्रार आरके चौधरी, पीएस अरोड़ा, प्यार चंद, गौरव महाजन, राकेश कैंथला, अविनाश चंद्र सहित कई अन्य गणमान्य मौजूद रहे।