हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) के कांग्रेस में विलय की अटकलों ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठजोड़ नहीं होने के बाद लगभग हाशिए पर चली गई हजकां अगर कांग्रेस से नाता जोड़ती है तो यह कांग्रेसी विचारधारा के नेताओं का एकजुट होना मात्र ही कहा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस रहित भारत का सपना देख रही भाजपा को प्रदेश में झटका लगना स्?वाभाविक है।
हाल ही में प्रदेश की भाजपा सरकार ने तीन नए जिलों के प्रस्ताव का ऐलान कर कांग्रेस, इनेलो और हजकां के गढ़ में सेंध लगाने का प्रयास किया है, क्योंकि गोहाना, हांसी व दादरी तीनों क्षेत्रों में भाजपा नहीं है। लेकिन हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के मुलाकात ने प्रदेश में कांग्रेस के नए समीकरण बनने के संकेत दिए हैं। हालांकि हजकां के कांग्रेस में विलय की अभी सिर्फ अटकलें ही हैं और कुलदीप बिश्नोई समेत पार्टी का कोई भी नेता इस संबंध में खुलकर कुछ नहीं कह रहे।
कुलदीप ने इसी हफ्ते पार्टी कार्यकारिणी की बैठक बुला ली है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में हजकां का भविष्य तय किया जाएगा। उधर, प्रदेश के कांग्रेस नेताओं के इस बारे में बयान काफी नरम हैं और वे स्वागत की मुद्रा में हैं। ?
अंदरूनी फूट में उलझी प्रदेश कांग्रेस इस समय आरक्षण आंदोलन के बाद हिंसा के आरोपों का मुकाबला करने में व्यस्त है। कभी गैर जाटों के एकछत्र नेता भजनलाल के दम पर प्रदेश में राज कर चुकी कांग्रेस को ऐसे समय अगर हजकां का साथ मिल जाता है तो उसे प्रदेश में वर्चस्व बढ़ाने का अवसर मिलेगा। कांग्रेस यह उम्मीद कर सकती है कि हजकां के जरिए पंजाबी बिरादरी और गैर जाट वर्ग उसके साथ आ सकता है।
हजकां के लिए भी यह मजबूरी वाले हालात हैं।
2005 के विधानसभा चुनाव के बाद भजन लाल परिवार कांग्रेस की राजनीति में हाशिये पर चला गया था, जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस छोड़कर हजकां का गठन किया। लेकिन आज भजन लाल की गैरमौजूदगी के बीच कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व में हजकां के लगातार दो विधानसभा व दो संसदीय चुनावों में प्रभावशाली प्रदर्शन न कर पाने के कारण उनकी खुद की राजनीतिक नैया डोलती नजर आ रही है। ऐसे में अपना राजनीति वजूद व वर्चस्व बनाए रखने के लिए कुलदीप बिश्नोई के सामने यही एक रास्ता है कि वे अपने दल हजकां का किसी अन्य दल में विलय करें।