रोते बिलखते शहीद के परिजन
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पुष्पेंद्र के घर में मातम पसरा हुआ है। पत्नी सुधा रो रोकर बेसुध हो रही है। बेटे के गम में बूढ़ी मां को होशोहवास नहीं है। पिता भी अपनी पथराई आंखों अपने लाल पार्थिव शरीर कर रहा है।
इस बीच सबसे ज्यादा चुभ रहा है, उस मासूम बेटे की खामोशी, जो सात माह पहले ही दुनिया में आया। अपने मासूम बेटे को पुष्पेंद्र ढंग से दुलार भी नहीं कर पाए। इससे पहले वो शहीद हो गए।
शहीद के परिवार की माली हालत ठीक नहीं है। उनके पिता राज मिस्त्री का काम करते हैं। बड़े भाई बनवारी लाल रिक्शा चला कर किसी प्रकार परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं।
पुष्पेंद्र के फौज में जाने के बाद परिवार वालों को हालात सुधरने की उम्मीद जगी थी, लेकिन नियत को कुछ और ही मंजूर था। बेटे की शहादत पर पिता को गर्व है तो गम भी है। पत्नी रो रोकर बेसुध हो रही है।