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सलवा जुडूमः हजारों जान लेने वाले अभियान की क्या है हकीकत

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चैतराम अट्टामी सलवा जुडूम आंदोलन के शीर्ष नेताओं में से एक हैं। एक दर्ज़न हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहने वाले चैतराम अट्टामी को आज भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट एक न एक दिन यह मान लेगी कि सलवा जुडूम सही आंदोलन था।
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दंतेवाड़ा के कसौली कैंप में बैठे अट्टामी अपनी मुट्ठियां भींचे कहते हैं, “अगर सलवा जुडूम ग़लत था तो मान कर चलिये कि भारत की आज़ादी की लड़ाई भी ग़लत थी।”

अट्टामी दस साल पहले बस्तर में शुरु हुए सलवा जुडूम आंदोलन के ज़िंदा बचे हुए शीर्ष नेताओं में से एक हैं। छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ सरकार के संरक्षण में शुरु हुए सलवा जुडूम यानी कथित शांति यात्रा के दस साल पूरे हो गए हैं।
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खाली हुए गाँव

4 जून 2005 को सरकार के संरक्षण में शुरू हुए इस अभियान में बड़ी संख्या में आदिवासियों को हथियार थमाए गए थे। उन्हें स्पेशल पुलिस आफिसर यानी एसपीओ का दर्जा दे कर माओवादियों से लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया गया था।

सरकारी आंकड़ों पर यकीन करें तो 2005 में माओवादियों के खिलाफ शुरु हुए सलवा जुडूम के कारण दंतेवाड़ा के 644 गांव खाली हो गए। उनकी एक बड़ी आबादी सरकारी शिविरों में रहने के लिये बाध्य हो गई। कई लाख लोग बेघर हो गये। सैकड़ों लोग मारे गए।

प्रतिबंध
नक्सलियों से लड़ने के नाम पर शुरू हुए सलवा जुडूम अभियान पर आरोप लगने लगे कि इसके निशाने पर बेकसूर आदिवासी हैं। कहा गया कि दोनों तरफ़ से मोहरे की तरह उन्हें इस्तेमाल किया गया। यह संघर्ष कई सालों तक चला।

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम मामले में सरकार की कड़ी आलोचना की। 5 जुलाई 2011 को सलवा जुडूम को पूरी तरह से खत्म करने का फैसला सुनाया गया। इन सब के बीच छत्तीसगढ़ सरकार आज भी दावा करते नहीं थकती कि यह जनता का स्व स्फूर्त आंदोलन था।

समर्थन

लेकिन रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार सलवा जुडूम को भाजपा सरकार और विपक्षी दल कांग्रेस की 50-50 की साझेदारी वाला आंदोलन बताते हैं। वो कहते हैं, “सरकार ने सलवा जुडूम को शुरु करने से ठीक पहले राज्य के सवर्ण गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल को हटा कर आदिवासी विधायक रामविचार नेताम को गृहमंत्री बना दिया।

क्योंकि सरकार को इस बात का अंदेशा था कि इस तरह का अभियान चलाने से आदिवासियों की अधिक संख्या में मौतें हो सकती हैं। एक सवर्ण गृहमंत्री सरकार के लिये असुविधा और बदनामी की वजह हो सकता है।”

हालांकि सुनील कहते हैं कि सलवा जुडूम हिंसक और आतंकी नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन था। सुनील कुमार कहते हैं, “शुरु में अहिंसक रहा यह आंदोलन उसी हद तक नाकामयाब हुआ, जिस हद तक वह हिंसक था।"

सलवा जुडूम का समर्थन करने वाले सुनील कुमार अकेले नहीं हैं। बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लूरी तो मानते हैं कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में सलवा जुडूम को लेकर अपना पक्ष सही तरीके से नहीं रख पाई।

कल्लूरी कहते हैं, “इस आंदोलन को माओवादियों के बौद्धिक समर्थकों ने बदनाम किया। वही लोग आज फिर से माओवादियों के समर्पण के खिलाफ भी अभियान चला रहे हैं।”
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विरोध

फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के राष्ट्रीय संयोजक प्रवीण पटेल उन चंद सामाजिक कार्यकर्ताओं में से हैं, जिन्होंने सलवा जुडूम को शुरुआत से देखा, समझा है। प्रवीण पटेल कहते हैं, “सलवा जुडूम ने आदिवासियों को कहीं का नहीं छोड़ा।

लेकिन सरकार सलवा जुडूम पर लगातार झूठ बोलती रही। बस्तर के कई लाख आदिवसियों ने सलवा जुडूम के नाम पर जो कुछ झेला है, उसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकती।”

इस बीच पिछले महीने ही सलवा जुडूम के नेता रहे महेंद्र कर्मा के बेटे छबींद्र कर्मा और सलवा जुडूम के नेता चैतराम अट्टामी ने एक बार फिर से बस्तर में जनजागरण अभियान चलाने की घोषणा की है। आईजी एसआरपी कल्लूरी ने उस अभियान को समर्थन देने की प्रतिबद्धता जताई है।
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