छत्तीसगढ़ की सियासत में यह माना जाता है कि चुनाव में जिसके साथ यहां का आदिवासी समुदाय होता है, उसकी सरकार बननी तय है, क्योंकि प्रदेश में आदिवासियों का एक बड़ा वोट बैंक है। बता दें कि छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों में से 29 सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव की अगर बात करें तो राज्य में भले ही भाजपा ने सरकार बना ली, लेकिन आदिवासी सीटों पर वो अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाए। साल 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने कुल 29 आदिवासी सीटों में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि भाजपा को महज 11 सीटें मिली थीं।
इस बार भी आदिवासी इलाकों में कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। भाजपा सिर्फ शहरी इलाकों में ही अच्छा प्रदर्शन करती दिख रही है, जबकि आदिवासी बहुल इलाकों में इस बार भी भाजपा पिछड़ती हुई नजर आ रही है।
नक्सलवाद पर लगाम लगाने में नाकाम रही सरकार
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पूरी तरह से हावी है। यहां भाजपा 15 सालों से सत्ता में है, इसके अलावा केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है, लेकिन इसके बावजूद रमन सरकार नक्सलवाद पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हुई। इस बार भी नक्सलवादी क्षेत्रों में लगातार नक्सली हमले होते रहे, लेकिन सबसे खास बात ये रही है कि इस बार इन क्षेत्रों में भारी मतदान भी हुआ। नतीजों से इतना तो साफ जाहिर हो रहा है कि इस बार यहां की जनता रमन सिंह की सरकार के खिलाफ ही थी।
काम आया कांग्रेस का वादा
चूंकि सूबे के किसान पहले से ही भाजपा सरकार से नाराज थे, इसका फायदा कांग्रेस ने खूब उठाया। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि किसानों के सभी कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। उनका यह वादा उनके लिए वरदान साबित हुआ और राज्य में रमन सिंह की सरकार का पत्ता साफ हो गया।