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Teejan Bai Passes Away: पंडवानी को दुनिया में पहचान दिलाने वाली तीजन बाई की अमिट उपलब्धियां

Sun, 05 Jul 2026 11:10 AM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर

सार

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्वभर में पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान कलाकार और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। शनिवार देर रात रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। 70 वर्षीय तीजन बाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं।
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तीजन बाई का निधन - फोटो : अमर उजाला
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्वभर में पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान कलाकार और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। शनिवार देर रात रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। 70 वर्षीय तीजन बाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन की खबर मिलते ही प्रदेश सहित देशभर के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

 
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तीजन बाई - फोटो : अमर उजाला
भिलाई के गनियारी गांव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने वाली तीजन बाई ने पंडवानी को नई पहचान दी। महाभारत की कथाओं को उन्होंने जिस अंदाज में मंच पर जीवंत किया, वह उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। उनकी बुलंद आवाज, प्रभावशाली अभिनय और दमदार प्रस्तुति ने लाखों लोगों को पंडवानी का दीवाना बनाया।
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तीजन बाई - फोटो : अमर उजाला
महज 13 वर्ष की उम्र में सार्वजनिक मंच पर पहली प्रस्तुति देने वाली तीजन बाई के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया, जब रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश के प्रमुख मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति की प्रतिनिधि बनकर पहुंचीं और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।

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तीजन बाई ने एक नहीं कई भावों पर अभिनय किया - फोटो : अमर उजाला
कापालिक शैली की सबसे बड़ी पहचान बनीं
तीजन बाई पंडवानी की कापालिक शैली की सबसे लोकप्रिय कलाकार थीं। इस शैली में कलाकार केवल कथा नहीं सुनाता, बल्कि पात्रों को मंच पर जीता है। तीजन बाई भीम, अर्जुन, द्रौपदी और दुर्योधन जैसे पात्रों के भावों को अपने अभिनय और आवाज के माध्यम से साकार कर देती थीं। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता तो कभी अर्जुन का धनुष। चेहरे के हाव-भाव, ऊर्जावान आवाज और मंच पर उनकी सक्रियता दर्शकों को पूरी तरह महाभारत के संसार में ले जाती थी।
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लोककला की वैश्विक पहचान बनीं तीजन बाई - फोटो : अमर उजाला
लोकभाषा और अभिनय ने बनाया अलग मुकाम
उन्होंने पारंपरिक कथा में स्थानीय बोली, लोक मुहावरे और हास्य का ऐसा समावेश किया कि पंडवानी हर वर्ग के लोगों तक पहुंच गई। यही वजह रही कि उनकी प्रस्तुतियां केवल भारत ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड, तुर्की, मॉरीशस समेत कई देशों में भी सराही गईं।
 
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तीजन बाई - फोटो : अमर उजाला
सम्मानों से भरा रहा जीवन
भारतीय लोक कला में अतुलनीय योगदान के लिए तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, देवी अहिल्या सम्मान, श्रेष्ठ कला आचार्य सम्मान, एम.एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार और मानद डी.लिट सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले।
 
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तीजन बाई - फोटो : अमर उजाला
तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक धरोहर का अवसान है, जिसने लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी प्रस्तुतियां, उनकी आवाज और पंडवानी को नया आयाम देने का उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
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