बस्तर के 'टार्ज़न' कहे जाने वाले चेंदरू का बुधवार को निधन हो गया। वो महीने भर से जगदलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती थे, जहां वो 13 अगस्त को लकवा मारने के बाद से भर्ती थे।
चेंदरू ने 1957 में ऑस्कर अवार्ड विजेता आर्ने सक्सडॉर्फ की स्वीडिश फिल्म ‘एन द जंगल सागा’ में काम किया था।
इस फ़िल्म में 10 साल के चेंदरू ने बाघों और तेंदुओं के साथ काम किया था।
उनके निधन पर 'बस्तर बैंड' के संचालक अनूप रंजन पांडेय ने कहा है कि चेंदरू के निधन के साथ ही एक इतिहास का अंत हो गया।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ और बस्तर को पहली बार किसी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी थी।
सबसे बड़े हीरो
अनूप रंजन पांडेय ने कहा कि आज छत्तीसगढ़ी में सैकड़ों फिल्में बन रही हैं, लेकिन चेंदरू रुपहले परदे के सबसे बड़े छत्तीसगढ़िया हीरो बने रहेंगे।
आर्ने सक्सडॉर्फ की स्वीडिश फिल्म ‘एन द जंगल सागा’ में लगभग 10 बाघ और आधा दर्जन तेंदुओं का उपयोग किया गया था।
फ़िल्म में दिखाया गया था कि किस तरह चेंदरू का दोस्त गिंजो एक मानवभक्षी तेंदुए को मारते हुए ख़ुद मारा गया और उसके बाद किस तरह चेंदरू की बाघ और तेंदुओं से दोस्ती हो गई।
जब फ़िल्म का प्रदर्शन हुआ तो चेंदरू को भी स्वीडन समेत कई देशों में ले जाया गया।
साल 1958 में कान फिल्म फेस्टिवल में भी यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई। कभी गढ़बेंगाल गांव से कभी बाहर नहीं गए चेंदरू फ़िल्म की वजह से महीनों विदेशों में रहे।
दुनिया में मशहूर
चेंदरू ने एक बार बातचीत में बताया था कि किस तरह विदेश में लोग उन्हें देखने आते थे और हैरान हो जाते थे कि इतना छोटा बच्चा बाघ के साथ रहता है, खाता-पीता है और उसकी पीठ पर बैठकर जंगल में घूमने की बातें करता है। चेंदरू रातों रात दुनिया भर में मशहूर हो गए।
चेंदरू को आर्ने सक्सडॉर्फ गोद लेना चाहते थे और इसके लिए उनकी पत्नी एस्ट्रीड सक्सडॉर्फ भी तैयार थीं। लेकिन दोनों के बीच तलाक के बाद फिर किसी ने चेंदरू को पूछा तक नहीं।
चेंदरू को बुढ़ापे में भी उम्मीद थी कि एक दिन उन्हें तलाशते हुए आर्न सक्सडॉर्फ गढ़बेंगाल गांव ज़रूर आएंगे।
लेकिन 4 मई 2001 को आर्ने सक्सडॉर्फ की मौत के साथ ही चेंदरू की यह उम्मीद भी टूट गई और आज बस्तर का यह टार्ज़न भी हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गया।