रायपुर शहर के चार युवाओं ने 110 साल की एक बुजुर्ग महिला की जिंदगी को इतनी नजदीक से देखी और दिखाई जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। शहर के युवा फिल्मकारों ने मुंबई में हुए एशियन फिल्म फेस्टिवल में चार श्रेणियों में पुरस्कार हासिल किया है। 110 साल की रज्जो की जिंदगी को बयां करती शॉर्ट फिल्म 'दाई मां' को बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्शन, बेस्ट सिनेमेटोग्राफी और बेस्ट एडिटिंग अवॉर्ड से नवाजा गया है।
इस रंग बदलती दुनिया में हर कोई अपनी धुन में सवार है। उपभोग करने की प्रवृति को बढ़ावा देती सूचनाएं और पूरा तंत्र व्यक्ति को अपने मतलब से मतलब रखना सिखाती है। ऐसे में मध्यप्रदेश के इन चार युवाओं ने शहर में भटकती हुई रज्जो की जिंदगी नजदीक से देखा। इस बुजुर्ग महिला की जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों ने उन युवाओं पर इतना गहरा असर डाला कि उन्होंने इसे अपने कैमरे में कैद करने की ठानी।
फिल्म को रायपुर के चार युवाओं के. शिवकुमार, मोहम्मद आमीर, एडिटर मयंक रायकवार और सुमन पांडेय ने बनाया और इसमें काम भी किया। इन्होंने उन बुजुर्ग महिला की पूरी दिनचर्या को 10 दिनों तक छुपते छुपाते नजदीक से देखा। फिर जो कहानी उभरी वो बहुत दिलचस्प थी।
बूढ़ी अम्मा रज्जो बाई दिनभर सड़क और चौराहों, मंदिर और दुकानों के बाहर भीख मांगती थीं। शाम ढले इनका पेट भरा होता या नहीं इसकी फिकर करने की बजाए वो भीख में मिले पैसों से पकौड़े खरीदतीं और सड़क के आवारा कुत्तों को खिलाती। रज्जो देवी अब कुछ बोल नहीं पाती लेकिन उनकी आंखें उनकी भावनाओं को बयां कर देती हैं। इन बेजुबान जानवरों का पेट भरकर रज्जो को जो खुशी मिलती है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
बूढ़ी अम्मा के पति की मौत के बाद उन्होंने अपने बेटे को पालने के लिए भीख मांगना शुरु किया था। उनका बेटा अब 35 साल का हो गया है और पंचर बनाने की एक दुकान में काम करता है। उसने चाहा कि उसकी मां अब घर पर आराम करे। लेकिन रज्जो देवी ने जिंदगी जीने के अपने अंदाज को नहीं बदला।
और भला बदले भी क्यूं...। इस चीज से उन्हें खुशी मिलता है और कुछ बेजुबानों की वो हमदर्द हैं। जिंदगी को जीने के लिए इसी खुशी की ही तो जरूरत होती है।
अपनी शॉर्ट फिल्म 'दाई मां' को पुरस्कार मिलने से ये युवा उत्साहित हैं। फिल्म को सोशल मीडिया पर लोगों ने खूब पसंद और शेयर किया है।