विधानसभा चुनाव से महज चार महीने पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी, वर्चस्व, इस्तीफा और दबाव की राजनीति देखने को मिल रही है। जहां बीजेपी, जनता कांग्रेस छत्तीगढ़ जोगी और आम आदमी पार्टी पूरी तरह से चुनाव पर फोकस कर अपनी जनाधार बढ़ाने में लगे हुए हैं।
विधानसभा चुनाव से महज चार महीने पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी, वर्चस्व, इस्तीफा और दबाव की राजनीति देखने को मिल रही है। जहां बीजेपी, जनता कांग्रेस छत्तीगढ़ (जोगी) और आम आदमी पार्टी पूरी तरह से चुनाव पर फोकस कर अपने-अपने जनाधार बढ़ाने में लगे हुए हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस गुटबाजी से गुजर रही है। आज गुरुवार को कांग्रेस में एक अलग ही नजारा देखने को मिला। स्कूल शित्रा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम ने आज अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान उनके चेहरे पर मंत्री पद छोड़ने की मायूसी साफतौर पर दिख रही थी। अंबिकापुर के गोविंदपुर में मीडिया से चर्चा में उन्होंने कहा कि 'इस्तीफा दिया नहीं जाता, ले लिया जाता है'। मंत्रिमंडल से हटने का उनके चेहरे पर हाव-भाव स्पष्टतौर पर दिख रहा था।
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उन्होंने इस दौरान कहा कि मंत्री मंडल में किसी को रखना और नहीं रखना ये मुख्यमंत्री के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है। मुख्यमंत्री पूरे राज्य के होते हैं। मत्रिमंडल में किसको जगह कहां देना है। उनका प्रसाद होता है। वो जब चाहे , जिसे प्रसाद दे सकते हैं। मुझसे कहा गया कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का निर्देश है, आपको इस्तीफा देना है। एक सवाल पर कहा कि इस्तीफा दिया नहीं जाता, उसे लिया जाता है। इस्तीफा देने की जो प्रक्रिया है, उसका पालन किया गया है। इससे स्पष्ट है कि उनकी इच्छा और मन के विपरित उनका इस्तीफा लिया गया है।
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क्या हैं सीएम के बयान के मायने
दूसरी ओर मुख्यमंत्री बघेल ने शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम के इस्तीफे पर कहा कि टेकाम का इस्तीफा मिला है, राज्यपाल को भेज दिया गया है। यानी उन्होंने ये कहा कि टेकाम ने इस्तीफा दिया है। जबकि टेकाम के बयान से ये साफ जाहिर होता है कि उन्होंने खुद स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया है। सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा है कि वे चुनाव से महज तीन-चार महिने पूर्व इस्तीफा नहीं देना चाहते थे पर सूबे के सरदार ने उन पर दबाव बनाकर पार्टी हाईकमान के निर्देशों का हवाला देकर इस्तीफा लिया है। इसलिए मंत्री टेकाम ने मीडिया के सामने ये क्लीयर नहीं किया कि वे खुद अपनी मर्जी से या स्वेच्छा से इस्तीफा देना चाहते हैं बल्कि उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि 'इस्तीफा दिया नहीं जाता, ले लिया जाता है'। उनकी इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि उन पर दबाव बनाकर मजबूर करके लिया गया है।
वहीं टीएस सिंहदेव और सीएम भूपेश की सियासी अनबन किसी से छुपी नहीं है। 'बाबा' गाहे-बगाहे सीएम और राज्य सरकार पर तंज कसते रहे हैं। साढ़े चार साल तक राज्य सरकार से असंतुष्ट दिखने पर कांग्रेस हाईकमान ने राज्य में होने वाले चुनाव में नुकसान की आशंका से चुनाव से महज तीन-चार महीने पहले उन्हें डिप्टी सीएम का पद देकर उन्हें खुश करने की कवायद की। अब वो राज्य सराकर में दूसरे नंबर के नेता हो गए हैं, हालांकि उन्हें दूसरे नंबर का नेता पहले से ही माना जाता रहा है।
मोहन मरकाम को मंत्री पद की ताजपोशी, तो दीपक बैज को पीसीसी चीफ की कमान
तीसरी और ये भी चर्चा थी कि पूर्व पीसीसी चीफ मोहन मरकाम की कार्यशैली से सीएम भूपेश बघेल नाखुश थे। पिछले एक-डेढ़ साल से गाहे-बगाहे सीएम भूपेश और पीसीसी चीफ मोहन मरकाम के बीच मतभेद की खबरें देखने -सुनने को मिलती रही हैं। इतना ही नहीं छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रभारी कुमारी शैलजा से भी संगठन में नियुक्ति को लेकर विवाद दिखा। नाराज एक गुट की बात पार्टी हाईकमान दिल्ली तक पहुंचती रही। मरकाम को मार्च में ही हटाने की चर्चा जोरों पर थीं। इस दौरान पार्टी आलाकमान ने दीपक बैज को दिल्ली बुलाया था। उसके बाद से ही यह माना जा रहा था कि मरकाम का पीसीसी चीफ की कुर्सी छोड़ना तय है। कुछ दिनों तक राज्य में पार्टी संगठन के कई बड़े कार्यक्रम होने से यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सियासी गलियारे में चर्चा यह भी थी कि मरकाम को हटाए जाने के बदले में ही सीएम भूपेश ने सिंहदेव को डिप्टी सीएम बनाने पर तैयार हुए थे। 14 जुलाई को रायपुर में मौन सत्याग्रह के बाद देर शाम पार्टी हाईकमान ने मरकाम को हटाने और दीपक बैज को नया पीसीसी चीफ बनाने के लिए लेटर जारी दिया। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का ये साफ संकेत है कि सराजस्थान और पंजाब जैसे हालात इस राज्य में नहीं बनने दिए जाएंगे। इसलिए सबको साधने की कवायद चल रही है। बहरहाल, कांग्रेस की इस कवायद से उसे क्या फायदा मिलता है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।