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नौकरी छोड़ बने सियासत के ‘बादशाह’

Thu, 24 Oct 2013 07:46 PM IST
अमर उजाला
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छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाग्य आजमा रहे ऐसे कई बड़े नेता हैं, जिन्होंने सियासत में पैर जमाने के लिए अपनी अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ दी।
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सीजीखबर के मुताबिक कुछ ने तो कलेक्टर, नायब तहसीलदार, डॉक्टर, मास्टर जैसी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और राजनीति में आए। इनमें से कुछ सफल भी हुए।

कई ने निजी नौकरी छोड़ी और खुद को साबित किया। सियासत की बिसात पर आज या तो वे बादशाह हैं या बादशाह बनाने के लिए खुद को इतना जरूरी बना लिया है, जिसे किंगमेकर कहा जा सकता है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे लोग शामिल हैं।

अजीत प्रमोद कुमार जोगी, आईएएस
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी 80 के दशक में रायपुर के कलेक्टर हुआ करते थे। वे 1987 में इंदौर के भी कलेक्टर रहे। इसके बाद उन्होंने आईएएस की नौकरी छोड़ी।
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कांग्रेस की ओर से वे दो बार रायगढ़ और महासमुंद लोकसभा सांसद बने। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद वे यहां के पहले मुख्यमंत्री बने वर्तमान में वे मरवाही विधानसभा से कांग्रेस के विधायक हैं।

डॉ. रेणु जोगी, सरकारी डॉक्टर
सूबे की कांग्रेस विधायक डॉ. रेणु जोगी रायपुर मेडिकल कॉलेज में नेत्र विशेषज्ञ व असिस्टेंट प्रोफेसर थीं। उनकी लिखी कई किताबें देश के मेडिकल कालेजों में पढ़ाई जाती हैं।

जोगी की अस्वस्थता के बाद उन्होंने सरकारी सेवा छोड़कर राजनीति का रास्ता पकड़ लिया। और आज वे खुद कांग्रेस में एक प्रभावशाली भूमिका में हैं।

डॉ. चरणदास महंत, नायब तहसीलदार
अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत होंगे। वे 1979 में नायब तहसीलदार थे। उन्होंने भी नौकरी छोड़कर राजनीति को अपना लिया। 1980 में कांग्रेस से लोकसभा सांसद चुने गए। अभी वे केंद्रीय राज्य मंत्री हैं।

प्रदेश में चुनाव के दौरान कांग्रेस में वे सबसे बड़ी ताकत के रूप में देखे जा रहे हैं। उन्होंने काफी कोशिश कर कांग्रेस को एकजुट रखा है।

ननकीराम कंवर, राजस्व विभाग में नौकरी
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम कंवर कभी राजस्व विभाग में नौकरी करते थे। बाद में उन्होंने वकालत भी की। फिर वे राजनीति में आ गए। वे अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कई बार मंत्री बने।

वे अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं। कई बार इसी वजह से उनका प्रशासनिक अफसरों से टकराव भी हुआ है।

डॉ. के.एम. बांधी, डॉक्टर
राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. के.एम. बांधी पहले सरकारी डॉक्टर थे। किसी मामले में जोगी सरकार ने उनके खिलाफ जांच बिठाई और बर्खास्त कर दिया। बांधी भाजपा में शामिल हो गए।

भाजपा सरकार बनी तो स्वास्थ्य मंत्री बने। वर्तमान में वे फिर से चुनाव मैदान में हैं।

नंद कुमार साय, शिक्षक
छत्तीसगढ़ में दिग्गज आदिवासी नेता और भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार सांसद नंद कुमार साय राजनीति में आने से पहले वनवासी आश्रम में शिक्षक थे। पार्टी के कद्दावर नेता दिलीप सिंह जूदेव और उनके पिता उन्हें राजनीति में लेकर आए।
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साय नेता प्रतिपक्ष से लेकर लोकसभा सांसद भी रहे। अभी वे राज्यसभा सांसद हैं। उनकी सक्रियता से आदिवासी नेताओं में खलबली है।

प्रेमप्रकाश पांडे, अधिकारी
छत्तीसगढ़ के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडे भिलाई स्टील प्लांट में अधिकारी थे। वे विधानसभा के दूसरे अध्यक्ष भी बने। पिछली बार वे चुनाव हार गए थे।

उन्होंने बड़े लंबे समय तक भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी की। बाद में राजनीति का दामन थामा। वर्तमान में वे भिलाई से फिर चुनाव मैदान में हैं।

विक्रम उसेंडी, शिक्षक
वर्तमान सरकार में वन मंत्री विक्रम उसेंडी पहले शिक्षक थे। वे 2003 में रमन सरकार में शिक्षा मंत्री बने। वे बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष भी हैं।

त्रिविक्रम भोई, डॉक्टर
बसना के पूर्व विधायक पहले डॉक्टर थे। विधायक बनने के बाद रमन सरकार में उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग का संसदीय सचिव बनाया गया।

इसके अलावा हाल ही में कांग्रेस ने कुछ नए चेहरों को भी मौका दिया है जिनमे पंचायत सचिव, शिक्षाकर्मी जैसे पद से त्यागपत्र देने वाले लोग शामिल हैं।
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