यहां के लोगों का कहना है कि उनकी लड़ाई सरकार के साथ नहीं बल्कि हक, रोजगार और शोषण के खिलाफ है। उनका कहना है कि बस जो भी गांव में आए उनकी इजाजद से ही आए और गांव में ग्राम सभा ही सर्वोच्च रहेगी व सारे फैसले लेगी। लोगों का कहना है कि बच्छरांव गांव में 22 अप्रैल को पत्थगड़ी लगाई गई थी और अगले छह महीनों में आधा दर्जन से भी ज्यादा पत्थलगड़ी लग जाएगी। इससे यह साफ प्रतीत होता है कि आंदोलन सुनियोजित तरीके से चल रहा है। लेकिन जब लोगों से पूछा गया कि यह सब तैयारी कौन करवा रहा है तो इस पर वह खामोश हो गए।
लोगों का कहना है कि उन्हें बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। उनके गांव के घरों में केवल एक बल्ब जलता है। इसके अलावा वहां टीवी वगैरह कुछ भी नहीं है। लोगों ने बताया कि उनके पीने के लिए पानी नहीं है, हर साल सूखा पड़ जाता है, तालाब खुदाई और सड़क बनाने का काम बंद पड़ा है। इसके अलावा साल 2013 से रोजगार गारंटी का पैसा भी नहीं मिला है। वहीं दस साल से गांव वाले पुल की मांग कर रहे हैं लेकिन अभी तक उसकी योजना भी नहीं बनी है। लोगों ने बताया कि सिहारडांड के साथ कलिया गांव में भी अभी तक बिजली नहीं आई है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का कहना है कि अगर जशपुर में प्रजातांत्रिक और धार्मिक तरीके से सब हो रहा है तो ठीक है लेकिन अगर गैरकानूनी तरीके से कुछ किया जाएगा तो कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि विकास कार्य संवैधानिक तरीके से होते हैं और विकास की राह में किसी को बाधा नहीं पहुंचानी चाहिए। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल का बयान भी सामने आया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के फ्लॉप विकास मॉडल की ही देन है पत्थलगड़ी। उन्होंने कहा कि पत्थगड़ी आंदोलन आदिवासियों के शोषण और दमन के खिलाफ जनआक्रोश है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को जानकारी होनी चाहिए कि यह मामला धार्मिक है या नहीं और अगर मगर नहीं करना चाहिए।