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छत्तीसगढ़ : सुरक्षा बलों की बढ़ती संख्या देख घबरा गए हैं नक्सली, इसलिए कर रहे हैं घातक हमले

Tue, 06 Apr 2021 08:25 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर

सार

  • केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के चार शिविर अकेले बीजापुर और सुकमा में फरवरी 2021 में खोले गए थे
  • छह अन्य 2017 में स्थापित किए गए थे, जबकि 2018 में नौ, 2019 में एक और 2020 में चार शिविर स्थापित किए थे
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नक्सलियों से सुरक्षाबलों का मुकाबला
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ में बस्तर-सुकमा के 1,200 वर्ग किलोमीटर में फैले क्षेत्र को माओवादियों का गढ़ माना जाता है। पिछले कुछ सालों में सरकार ने कुछ अभियान चलाए जिनमें अधिक संख्या में नक्सली मारे गए और बहुतों ने खुद आकर आत्मसमर्पण किया। 

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अब इस इलाके में सुरक्षाबलों ने अपने 24 स्थायी कैंप बना लिए हैं। साथ ही सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने लगभग 600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले गहरे जंगल को अपने नियंत्रण में ला दिया है इसलिए माओवादी खासा चिढ़ गए हैं। इसी कारण हताशा में उसने बीजापुर में इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया।

छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर सीमावर्ती इलाके में शनिवार को 700 से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों को घेरकर नक्सलियों ने हमला किया। नक्सली और सुरक्षाबलों के बीच हुई मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हो गए थे।
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कई शिविर किए स्थापित 
सरकार ने माओवादी की बस्तर-सुकमा बेल्ट में खासा जोर दिया है। यहां केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के चार शिविर अकेले बीजापुर और सुकमा में फरवरी 2021 में खोले गए थे और छह अन्य 2017 में स्थापित किए गए थे। 2018 में नौ, 2019 में एक और 2020 में चार शिविर स्थापित किए थे।

ये नए शिविर परिचालन में गलगम, एलारमगडू, मिनपा, मुकर्रम नाला, भद्रिमौ, पुंजर नाला, पुष्पपाल, विश्रामपुरी, नेतनार, कोलेंग नाला, मुजापदर, पालोदी, पामेड और तरारम में खोले गए हैं।  

बस्तर बेल्ट के अलावा, अन्य नए माओवादी क्षेत्रों में दर्जनों की संख्या में नए स्थायी शिविर स्थापित किए गए हैं, जिनमें पिछले चार वर्षों में 2,000 वर्ग किमी का आंध्र-ओडिशा सीमा क्षेत्र, 4,500 वर्ग किलोमीटर अबुझमाड़ वन क्षेत्र और झारखंड के इलाके शामिल किए गए हैं। 

शिविरों पर घात न लगा पाने की हताशा 
माओवादी इन स्थायी शिविरों पर आसानी से घात नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वे पूरी तरह से शस्त्रों से सुसज्जित हैं और इनके पास हमेशा बैकअप होता है। यहां सेना स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को करने में सरकार की सहायता करती है ताकि अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचे। लेकिन ये माओवादी नहीं चाहते कि विकास कार्य हो। नक्सली लोगों को अलग-थलग रखना चाहते हैं। यही कारण हैं माओवादी चिढ़ रहे हैं और हताशा में हमला कर रहे हैं।

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