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कश्मीर से खतरनाक है 'बस्तर की लड़ाई'

Sat, 09 Nov 2013 08:11 PM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला,बस्तर
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बस्तर एक बार फिर बैलेट और बुलेट की लड़ाई के लिए तैयार है। बस्तर में तैनात सीआरपीएफ के जवानों में से अनेक ऐसे हैं, जो पहले कश्मीर या पूर्वोत्तर में भी तैनात रह चुके हैं।
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जीरमघाटी के रास्ते पर तैनात एक ऐसे ही जवान के लिए बस्तर में यह पहला मौका है। कुछ महीने वह कश्मीर में तैनात था और अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के सिलसिले में उसकी तैनाती इस इलाके में हुई है।

घने जंगलों के बीच एनएच 30 के एक खतरनाक मोड़ पर खड़े इस जवान से जब अमर उजाला ने पूछा कि कश्मीर और बस्तर में क्या फर्क नजर आ रहा है।

उसने कहा, वहां आतंकवाद है, यहां माओवाद, लेकिन हिंसा दोनों जगह हैं। मगर उसने माना कि जंगल के भीतर से होने वाली लड़ाई की वजह से माओवादी हमले अधिक खतरनाक होते हैं।
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ऐसा क्यों? यह जवान ही नहीं, इस घाटी में तैनात कश्मीर में रह चुके अनेक जवानों का अनुभव है कि कश्मीर में आतंकी सामने से हमला करते हैं, लेकिन माओवादी तो पीछे से भी हमला कर सकते हैं।

















इसके अलावा यहां की भौगोलिक परिस्थिति ऐसी है कि घने जंगलों और थोड़ी ऊंचाई से हमला किया जाए तो बचना मुश्किल हो जाता है।

दरअसल अप्रैल 2010 में सीआरपीएफ के जवानों पर हुआ भीषण हमला भी इसी तरह का था, जिसमें 78 जवान मारे गए थे।

ये जवान सर्चिंग में निकले थे, और तीन तरफ से माओवादियों से घिर गए थे। इसी तरह जीरमघाटी में कांग्रेस के काफिले में हुए हमले में भी माओवादी ऊंची पहाड़ी में घात लगाकर बैठे थे। मगर इस बार यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम दिखते हैं।
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छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स के जवानों के साथ तैनात सीआरपीएफ के जवान एनएच 30 के आसपास और गांवों में गश्त कर रहे हैं।
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