देश की शासन व्यवस्था बदलने के नाम पर सरकार के खिलाफ बंदूक उठा चुके नक्सली चुनावी प्रक्रिया में नोटा के जरिए घुसने की कोशिश में लगे हैं।
नक्सलियों ने इसका एक छोटा प्रयोग इस बार से छत्तीसगढ़ चुनाव में किया है। राज्य के नक्सली प्रभाव वाले बस्तर के 12 विधानसभा सीटों पर पांच से दस फीसदी वोटरों ने नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) का बटन दबाया है।
इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की चल रही समीक्षा के मुताबिक नक्सली ने शुरू से ही दूर दराज के वोटरों से नोटा पर उंगली लगवाने की मुहिम में लगे थे ताकि सुरक्षा बलों की भरपूर और प्रभावी तैनाती के बावजूद चुनाव में अपना प्रभाव दर्ज करा सकें।
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गृहमंत्रालय के शीर्षस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि नक्सलियों के पास अभी भी मौका है कि वह आम आदमी पार्टी की तरह चुनावी राजनीति में आकर व्यवस्था बदलने की कोशिश करें।
अधिकारी के मुताबिक बस्तर में नोटा पर वोट डलवा कर नक्सलियों ने अपनी उपस्थिति तो दर्ज कराई है। इससे स्थानीय चुनावी समीकरण भी बदले हैं। लेकिन इससे कोई मसला हल नहीं होता। गृह मंत्रालय को मिले आंकड़े के मुताबिक नक्सल प्रभावित बारह सीटों पर पांच से 11 फीसदी वोट नोटा को गया है। इनमें सबसे ज्यादा चित्रकोट जहां करीब 1,19,311 वोटों में 10,848 वोट नोटा पर पड़ा है।
आंकड़ों के मुताबिक इन सीटों पर विजयी रहे उम्मीदवारों ने नौ से ग्यारह हजार वोटों से ही जीत दर्ज की है। ऐसे समीकरण में पांच से 11 फीसदी वोट नोटा पर पड़ना खासा मायने रखता है।
माना जाता था कि छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने का रास्ता बस्तर से होकर जाता है। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां 12 में से 11 सीटें जीत कर सरकार बनाई थी। इस बार बस्तर की बारह सीटों में आठ पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है जबकि भाजपा के पाले में चार सीटें आईं।
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नक्सल प्रभावित क्षेत्र न होने के बावजूद मरवाही में पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी की सीट पर 7000 वोट नोटा पर पड़ें। मंत्रालय का मानना है कि यह कांग्रेस और भाजपा सहित सभी पार्टियों के प्रति लोगों का गुस्सा है।
अधिकारियों के मुताबिक जोगी परिवार के साथ वोटरों ने भाजपा और अन्य दलों को खारिज कर संदेश दिया है कि अगर उन्हें ‘आप’ की तरह विकल्प मिले तो वोट नोटा पर नहीं डालेंगे।