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Vat Savitri Vrat: कोरबा में वट सावित्री व्रत और शनि जयंती की धूम, सुहागिनों ने की पति की दीर्घायु की कामना

Sat, 16 May 2026 04:41 PM IST
कोरबा ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, कोरबा

सार

कोरबा के सीतामढ़ी सहित पूरे शहर में शनिवार को वट सावित्री व्रत और शनि जयंती का पर्व श्रद्धा के साथ मनाया गया। महिलाओं ने बरगद के पेड़ की पूजा कर परिक्रमा की, निर्जला व्रत रखा और पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि एवं अखंड सौभाग्य की कामना की।
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कोरबा में वट सावित्री व्रत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शनिवार को कोरबा के सीतामढ़ी सहित पूरे शहर में वट सावित्री व्रत एवं शनि जयंती का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से ही मंदिरों और पूजा स्थलों में महिलाओं एवं श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और व्रत रखा।

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इस अवसर पर सीतामढ़ी स्थित शनि मंदिर में शनि जयंती पर विशेष पूजा-अर्चना और तेलाभिषेक किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान शनिदेव के दर्शन कर परिवार की खुशहाली, संकटों से मुक्ति और जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना की। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। इसी कड़ी में सीतामढ़ी स्थित प्राचीन राम गुफा मंदिर के सामने श्रद्धालुओं के लिए शीतल शरबत का वितरण किया गया, जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया।

सीतामढ़ी के अलावा शहर के बस स्टैंड, संजय नगर, शारदा विहार, मुड़ापार, एसईसीएल कॉलोनी, रवि शंकर कॉलोनी, निगम कॉलोनी और एमपी नगर कॉलोनी में भी वट सावित्री व्रत को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही महिलाएं सोलह श्रृंगार कर वट वृक्ष के नीचे एकत्र हुईं। कच्चे सूत से वृक्ष की परिक्रमा कर रोली, अक्षत, फूल, फल और भीगे चने चढ़ाए। कथा सुनी और बड़ों का आशीर्वाद लिया।
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कोरबा के औद्योगिक क्षेत्र दीपका, दर्री, कुसमुंडा और बांकी मोंगरा में भी वट सावित्री व्रत करने वाली महिलाओं की भारी भीड़ देखी गई। महिलाओं ने कहा कि इस पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने तप से यमराज से पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। इसलिए सुहागिनें पति की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं।

पूरे दिन सीतामढ़ी क्षेत्र का माहौल भक्तिमय बना रहा। स्थानीय लोगों ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस बार भी पर्व को पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। मंदिरों में प्रसाद वितरण भी हुआ। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन एवं पूजा समितियों के सदस्यों की सक्रिय भूमिका रही।

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