ईष्ट देव कंचना ध्रुव पताके से मारते हैं रावण को
दरअसल, देवभोग के दशहरा का इतिहास 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। इसे शाही दशहरा का दर्जा मिला हुआ है। दशहरे के दिन आसपास के गांव में विराजित ग्राम देवता विग्रह के रूप में अपनी पताका के साथ देवभोग पहुंचते हैं। फिर लंकेश्वरी देवी के नेतृत्व में रावण के पुतले की परिक्रमा की जाती है। इसके बाद जमींदारों के ईष्ट देव रहे कंचना ध्रुव अपनी पताका से पुतले को मारते हैं, तब रावण दहन किया जाता है। यह परंपरा तत्कालीन जमींदार नागेंद्र शाह के पूर्वजों के जमाने से चली आ रही है।
मंदिर में लोगों का प्रवेश है वर्जित
देवभोग से करीब 35 किमी दूर जूनागढ़ में लंकेश्वरी देवी का मंदिर स्थापित है। ओडिशा को पहले कलिंग क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। 18वीं शताब्दी के बाद कलिंग के इस इलाके तक ईस्ट इंडिया कंपनी पहुंच गई। तब शाह परिवार छुरा से लेकर देवभोग तक जमींदारी संभाल रहा था। उन्होंने देवभोग से 12 किमी दूर बरही ग्राम में भी 1914 में लंकेश्वरी देवी मंदिर स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की। मंदिर में आम लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर में प्रवेश के लिए आयताकार विशाल छिद्र बनाया गया है जहां से पुजारी ही आ और जा सकता है।
सपने में देवी आती थीं, तो देवभोग में भी बनाया गया मंदिर
स्थानीय निवासी नारायण अवस्थी ने साल 1955 में जीवन लाल के नाम पर देवभोग के मुख्य चौराहे पर दो एकड़ जमीन खरीदी थी। इस जमीन को लेने के बाद ही परिवार में दिक्कतें शुरू हो गईं। घर की बहू भगवती देवी जब काफी परेशान हो गईं तो परिवार से सपने की चर्चा की। बताया कि खरीदी गई जमीन जमींदारों का खलिहान हुआ करती थी। वहां देवी का मंदिर बनना है। इस पर नींव की खुदाई शुरू हुई तो पहले से ही बना ढांचा दिखाई दिया। उसी पर फिर मंदिर स्थापित किया गया।