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छत्तीसगढ़: मनरेगा की मजदूरी भाग्य भरोसे

Mon, 14 Jul 2014 11:35 AM IST
आलोक प्रकाश पुतुल/छत्तीसगढ़ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के राजपुर गांव में रहने वाले मज़दूरों को आठ महीने की बकाया मज़दूरी मिलने की बेहद ख़ुशी है।
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इन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मज़दूरी के लिए अफ़सरों का दरवाज़ा खटखटाया। बात न बनी तो उन्होंने ज़िला मुख्यालय पर धरना दिया।

ख़बर आई कि मुख्यमंत्री रमन सिंह अगले दिन धरनास्थल के पास से गुजरने वाले हैं।

तुरंत संबंधित पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने इनकी बकाया रक़म इनके खाते में जमा कर दी।

मगर छत्तीसगढ़ के दूसरे ज़िलों के मज़दूरों की किस्मत ऐसी नहीं है।

मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िले राजनांदगांव में तो मनरेगा में काम करने वाले मज़दूरों को पिछले दो साल में क़रीब चार करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है।
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लेकिन महासमुंद ज़िले में पिछले तीन महीने से मनरेगा के तहत कोई भुगतान नहीं हुआ है। यहां के कई मज़दूर सालों से अपनी मज़दूरी के लिए धक्के खा रहे हैं।

राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर कहते हैं, “राज्य में रोज़गार गारंटी योजना संतोषप्रद है। इसकी स्थिति न तो बहुत अच्छी है और न बहुत ख़राब।”

हालत
छत्तीसगढ़ सरकार भले इस योजना में 150 दिनों तक काम देने की गारंटी का दावा करती हो, पर न तो राज्य में इतने दिन तक काम की गारंटी है और न काम के बाद समय पर मज़दूरी के भुगतान की।

सरकारी आंकड़े देखें, तो साल भर में 42 लाख से अधिक मज़दूरों को कार्ड दिए गए, लेकिन 100 दिन का रोज़गार पाने वालों की संख्या साढ़े तीन लाख से भी कम थी।

यानी केवल आठ फ़ीसदी लोगों को ही 100 दिन का काम मिल पाया।

मज़दूर संगठन के नेता नंद कश्यप कहते हैं, “काम देने की ज़िम्मेवारी भी सरकार की है पर वह काम की कम मांग और दूसरे बहाने बनाकर पल्ले झाड़ लेती है।”

छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों में खेती से जुड़े नए प्रयोग कर रहे प्रदीप शर्मा मानते हैं कि जनता की अधिक भागीदारी के बिना इस योजना की सफलता संदिग्ध रहेगी।
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अजय चंद्राकर कहते हैं, “भुगतान की व्यवस्था ठीक करने के लिए कम से कम 250 नए बैंक खोलने पड़ेंगे। वहीं डाकघरों में भी नोडल अधिकारियों की व्यवस्था करनी पड़ेगी।”
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