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छत्तीसगढ़: हाई कोर्ट ने टावर कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का पुलिस विभाग का आदेश किया निरस्त

Sat, 10 Oct 2026 06:38 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर

सार

हाईकोर्ट ने संचार टावर लगाने वाली दिल्ली की कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का पुलिस विभाग का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कंपनी को 30 दिन में जवाब देने का मौका दिया। जानिए 33 टावर, 20 टावरों के बकाया भुगतान और ब्लैकलिस्टिंग विवाद का पूरा मामला।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग के उस आदेश को निरस्त कर दिया है जिसके माध्यम से उसने संचार टावर लगाने वाली दिल्ली की एप्लाइड कम्युनिकेशंस एंड कंट्रोल्स कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया था। मुख्य न्यायाधीश कृष्न राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्णय दिया कि किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान को ब्लैकलिस्ट करने जैसी गंभीर कार्रवाई करने से पूर्व पुलिस विभाग को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का उचित अवसर देना चाहिए था। पीठ ने पाया कि पुलिस विभाग ने कंपनी को अलग से कारण बताओ नोटिस दिए बिना ही ब्लैकलिस्ट कर दिया। अदालत ने पुलिस विभाग के इस कदम को प्राकृतिक न्याय के स्थापित सिद्धांतों के प्रतिकूल माना। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग की इस कार्रवाई को रद्द कर दिया और कंपनी को 30 दिन के भीतर अपनी बात रखने का अवसर प्रदान किया है।
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प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
हाई कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष बल दिया कि ब्लैकलिस्टिंग जैसी कठोर कार्रवाई किसी भी संस्थान के व्यावसायिक हितों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती है। अदालत ने टिप्पणी की कि विभाग को ऐसा बड़ा कदम उठाने से पहले संबंधित पक्ष को अपनी सफाई पेश करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए था। पुलिस विभाग ने पूर्व में कमियां दूर करने के संबंध में जो पत्र प्रेषित किया था, उसे ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई से पहले दिया जाने वाला कारण बताओ नोटिस स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि पुलिस विभाग ने कंपनी को अपनी कार्य-प्रणाली का संपूर्ण ब्योरा प्रस्तुत करने और टावरों के निर्माण में निविदा की शर्तों का पालन सिद्ध करने का पर्याप्त समय नहीं दिया। इस प्रकार पुलिस विभाग ने प्रक्रियात्मक चूक की, जिसके कारण हाई कोर्ट ने ब्लैकलिस्टिंग का निर्णय रद्द कर दिया।

बकाया भुगतान और मध्यस्थता का विवाद
दिल्ली स्थित कंपनी एप्लाइड कम्युनिकेशंस एंड कंट्रोल्स के प्रोपराइटर शिव कुमार शर्मा ने पुलिस विभाग के ब्लैकलिस्टिंग आदेश के विरुद्ध हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी। याचिकाकर्ता ने अदालत को अवगत कराया कि पुलिस विभाग ने कंपनी को 33 संचार टावर स्थापित करने का ठेका सौंपा था। कंपनी का दावा है कि उसने निर्धारित समय-सीमा के भीतर टावर लगाने का काम पूरा कर लिया था, परंतु पुलिस विभाग ने केवल 13 टावरों का ही भुगतान जारी किया। विभाग ने शेष 20 टावरों का भुगतान रोकते हुए यह तर्क दिया कि कंपनी ने निविदा में उल्लिखित मानकों के अनुसार निर्माण कार्य नहीं किया। वर्तमान में दोनों पक्ष इस बकाया राशि के भुगतान से जुड़े विवाद को लेकर मध्यस्थता की कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे हैं, जहां मामला विचाराधीन है।
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नोटिस और ब्लैकलिस्टिंग की समयरेखा
विवाद की समयरेखा के अनुसार, पुलिस विभाग ने 26 फरवरी 2026 को कंपनी को एक पत्र भेजा था। इसमें विभाग ने कथित कमियों को 15 मार्च तक दूर करने के लिए कहा था। विभाग ने पत्र में चेतावनी दी थी कि यदि कंपनी निर्धारित समय में सुधार नहीं करती है तो वह सुरक्षा राशि जब्त कर कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर देगा। इसके बाद पुलिस विभाग ने 16 जून 2026 को ब्लैकलिस्टिंग का आदेश जारी कर दिया। राज्य सरकार ने अदालत में विभाग का पक्ष रखते हुए कहा कि उसने 20 टावरों की कमियां सुधारने का पूरा अवसर दिया था। विभाग के अनुसार, कंपनी ने 12 अगस्त 2025 को लिखे पत्र में स्वीकार किया था कि उसने निविदा की शर्तों के अनुसार निर्माण नहीं किया और सुधार के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

तीस दिन में देना होगा जवाब
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों का विश्लेषण करने के बाद मामले को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं। पीठ ने रद्द किए गए ब्लैकलिस्टिंग आदेश को ही कारण बताओ नोटिस मानते हुए कंपनी को 30 दिन की समयसीमा के भीतर अपना विस्तृत जवाब पुलिस विभाग के सामने प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। कंपनी का लिखित जवाब प्राप्त होने के बाद पुलिस विभाग नियमानुसार अग्रिम कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा। आवश्यकता पड़ने पर विभाग कंपनी को सुनवाई का अवसर देकर कानून के अनुसार अंतिम फैसला ले सकता है। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस आदेश से कंपनी की सभी तकनीकी आपत्तियां या बकाया भुगतान से जुड़े विवाद स्वतः समाप्त नहीं होंगे, बल्कि पुलिस विभाग को आगे की पूरी प्रक्रिया कानून के प्रावधानों के अनुसार ही करनी होगी।
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