छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आधा दर्जन गांवों में दो दशक बाद मतदान कराने के लिए कड़े बंदोबस्त किए गए हैं। नक्सलियों के आतंक के कारण दंतेवाड़ा जिले में नदी पार के साथ ही कुआकोंडा-अरनपुर क्षेत्र में ऐसे आधा दर्जन गांव हैं जहां मतदान कराना बेहद कठिन काम रहा है। आलम यह है कि आधा दर्जन गांवों पर हुए चुनाव में एक भी वोट नहीं पड़ा था। लेकिन इस बार चुनाव आयोग के सुरक्षा इंतजाम को देखकर गांववाले मतदान को लेकर काफी उत्साहित हैं।
माओवादियों के दहशत की वजह से इन गांवों में मतदान नहीं हुआ। या फिर इन मतदान केंद्रों को करीब 10 किलोमीटर दूर बनाया जाता था। लेकिन फिर भी ग्रामीण वोट डालने नहीं पहुंचे। राज्य सरकार के नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए सशस्त्र अभियान सलवा जुड़ूम के बाद करीब दो दर्जन गांवों में महज 15 फीसदी से भी कम मतदान हो गया है।
आधा दर्जन केंद्रों पर हुई थी जीरो वोटिंग
2013 के विधानसभा चुनाव में दंतेवाड़ा सीट के करीब आधा दर्जन गांवों में जीरो वोटिंग हुई थी यानी इन केंद्रों पर एक भी वोट नहीं डाले गए। ये गांव थे अलनार, बड़ेगादम, पुरंगेल, बुरगुम, किडरीरास और काउरगांव।
जबकि दो केंद्रों गमावाड़ा और गुड़से पर सिर्फ दो-दो मत पड़े थे। कई मतदान केंद्र ऐसे रहे जहां 10 से कम वोट पड़े थे। यह केंद्र थे जबेली, समेली, मारजूम, चिकपाल, हांदावाड़ा, चेरपाल, पोटाली, अरनपुर, ककाड़ी, गुमियापाल, समलवार, तेलम, नीलावाया, मेड़पाल, मुलेर।
नक्सलियों की चेतावनी पर लोकतंत्र भारी
दंतेवाड़ा देश में अति नक्सल प्रभावित इलाकों में शुमार किया जाता है। नक्सलियों ने इस जिले में हर चुनावों के दौरान बहिष्कार की चेतावनी दी। बावजूद इसके यहां के लोगों की लोकतंत्र में आस्था है। लोगों को जिन इलाकों में माहौल सुरक्षित लगता है वहां बड़े पैमाने पर मतदान हुए हैं।
दंतेवाड़ा में विधानसभा चुनाव में वोटिंग
| साल |
मतदान (फीसदी में) |
| 2013 |
61.93 |
| 2008 |
55.60 |
| 2003 |
60.28 |