धान के कटोरे के नाम से मशहूर छत्तीसगढ़ में अभी धान कटाई का मौसम है और वोट कटाई का भी। सो, दोनों प्रमुख पार्टियां भाजपा और कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।
भाजपा ने पिछला चुनाव आखिर सस्ते चावल के मुद्दे पर ही जीता था।
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार अभी अंत्योदय और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को क्रमशः एक और दो रुपये किलो की दर से चावल दे रही है।
और अब उसने अपने घोषणा पत्र में सभी गरीबों को एक रुपये किलो चावल देने का वादा किया है।
तो कांग्रेस ने इससे एक कदम आगे बढ़कर अपने घोषणापत्र में आयकर दाताओं को छोड़ सभी लोगों को हर महीने मुफ्त में 35 किलो चावल देने का ऐलान किया है।
विधानसभा चुनावों के पहले दौर में राज्य में 11 नवंबर को नक्सल प्रभावित जिलों की 18 सीटों पर मतदान हुआ था, वहां सीधे तौर पर चावल का मुद्दा नजर नहीं आया।
मगर दूसरे दौर में बाकी की 72 सीटों पर 19 नवंबर को मतदान होना है, जहां चावल का मुद्दा काफी अहम माना जा रहा है।
सस्ते चावल ने ही मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को 'चाऊर वाले बाबा' बना दिया था।
राइस मिलों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये धान की खरीद करने वाले नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष लीलाराम भोजवानी कहते हैं कि इस बार भी लोग 'चाऊर वाले बाबा को ही वोट देंगे।'
कांग्रेस इसकी काट के तौर पर हाल ही में अस्तित्व में आए खाद्य सुरक्षा कानून को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है।
यही नहीं, उसके नेता यह बताने से गुरेज नहीं करते कि रमन सरकार जो चावल एक या दो रुपये किलो दे रही है, उसके लिए सब्सिडी तो केंद्र से ही आती है। मगर आम लोग यह फर्क नहीं समझते।
चावल उपभोक्ताओं के साथ ही इसके उत्पादक किसानों को भी रिझाने की कोशिशें जारी हैं।
दोनों तरफ होड़ मची है। केंद्र सरकार ने धान का समर्थन मूल्य इस वर्ष पिछली बार के 1280 से बढ़ाकर 1345 रुपये प्रति क्विंटल किया है। रमन सरकार इस पर 270 रुपये का बोनस देती है।
कांग्रेस ने सत्ता में आने पर समर्थन मूल्य 2000 रुपये और 300 रुपये बोनस देने का वादा किया है।
हालांकि सस्ते चावल की योजना ने सरकारी खजाने पर खासा बोझ डाला है। इसका सीधा गणित है। सरकार राइस मिलर्स से एक क्विंटल धान के बदले 67 किलो चावल लेती है।
मोटे तौर पर बाजार में यह चावल 20 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है, मगर सरकार इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये दो रुपये किलो की दर से बेचती है।
इस तरह प्रति किलो 18 रुपये का नुक्सान सरकार को उठाना पड़ता है। भोजवानी के मुताबिक नागरिक आपूर्ति निगम ने पिछले वर्ष सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए 40 हजार टन चावल खरीदा था।
इससे नुकसान का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
मगर दो रुपये किलो चावल की लोकप्रियता ने रमन सरकार के उन मंत्रियों को भी चुप करा दिया है, जिन्हें यह योजना बोझ लगती है।
उनके एक वरिष्ठ मंत्री ने अमर उजाला से बातचीत में स्वीकार किया कि यह योजना वोट तो दिला सकती है, लेकिन राज्य की आर्थिक सेहत को कमजोर कर सकती है।
सस्ते चावल ने सामाजिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी खासा प्रभावित किया है। छत्तीसगढ़ के किसान नेता और कृषक बिरादरी के संयोजक आनंद मिश्रा कहते हैं, 'दो रुपये किलो चावल और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत मिलने वाली रोजी की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में एक नई पूंजी पैदा हो गई है, जो नकारात्मक कामों में लग रही है।'
उनका इशारा ग्रामीण क्षेत्रों में आटोमोबाइल की बढ़ती मांग और शराब की बढ़ती खपत की ओर है। वह कहते हैं, 'लोग दो रुपये किलो का चावल खाते हैं, सौ रुपये की दारू पीते हैं और बाइक में 75 रुपये लीटर का पेट्रोल डालकर घूमते हैं।'
हकीकत यह है कि सस्ते चावल के मुद्दे ने दूसरे बुनियादी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि चुनाव में यह कितना कारगर होगा यह कहना अभी मुश्किल है।
इस पर छत्तीसगढ़ के कृषि वैज्ञानिक डॉ संकेत का आकलन काफी दिलचस्प है। वह कहते हैं, 'चावल-धान के मुद्दे ने ग्रामीण क्षेत्रों के कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को भाजपा की ओर मोड़ दिया है, तो राज्य शासन के भ्रष्टाचार ने शहरी भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को कांग्रेस की ओर!'
छत्तीसगढ़ में चावल को चुनावी मुद्दा बनता देख बांग्लादेश के मशहूर कवि रफीक आजाद की ये पंक्तियां याद आती हैं,
दो वक्त दो मुट्ठी भात मिल जाए, तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फेर लूंगा...।
सबके लिए कुछ न कुछ
छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने पिछले पांच वर्षों में लोगों को लुभाने की ऐसी कोशिश की है, जिसकी मिसाल दूसरे राज्यों में नहीं मिलती। उसने हर तबके को कुछ न कुछ दिया है।
मसलन स्कूली छात्राओं को साइकिल, कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लैपटॉप और टेबलैट, हजामत का काम करने वालों को पेटी, घरेलू महिलाओं को सिलाई मशीन, राजमिस्त्री को औजार, कुम्हारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक से लेकर जंगलों में वनोपज एकत्र करने वाले आदिवासियों को चरणपादुका (चप्पल) तक।
मगर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि रमन सरकार की तरफ से शुरू की गई दाल-भात योजना अब नजर नहीं आती। आदिवासियों को वितरित की गईं गायों का भी अता-पता नहीं है।