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देश का मुख्य पर्यटन केंद्र बनेगा अपना चंपारण: 73 करोड़ के वल्लभाचार्य स्टैच्यू कॉम्प्लेक्स को मिली मंजूरी,जानें

Wed, 23 Sep 2026 01:54 PM IST
Lalit Kumar Singh अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर

सार

CG Champaran; Mahaprabhu Vallabhacharya: छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर स्थित महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चंपारण देश के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होगी। करीब 15 एकड़ में विकसित होने वाली परियोजना में महाप्रभु से संबंधित आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ा जाएगा।
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महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चंपारण - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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CG Champaran; Mahaprabhu Vallabhacharya: छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर स्थित महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चंपारण देश के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होगी। करीब 15 एकड़ में विकसित होने वाली परियोजना में महाप्रभु से संबंधित आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। इस दिशा में भारत पर्यटन मंत्रालय की केंद्रीय स्वीकृति एवं निगरानी समिति सीएसएमसी ने चंपारण्य में करीब 73.42 करोड़ रुपये की प्रस्तावित 'वल्लभाचार्य स्टैच्यू कॉम्प्लेक्स' परियोजना को मंजूरी दी है। 

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इस परियोजना को छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड पूरा करेगा। इसके लिए 18 महीने की अवधि तय की गई है। प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने परियोजना की स्वीकृति पर कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में पर्यटन, विशेषकर आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन के विकास को नई गति मिल रही है। चंपारण्य छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली को बेहतर पर्यटक सुविधाओं के साथ राष्ट्रीय स्तर के आध्यात्मिक पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की दिशा में यह स्वीकृति एक महत्वपूर्ण कदम है। परियोजना की डीपीआर एवं कार्य-सीमा तैयार है। स्वीकृति मिलने के बाद निविदा प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी है। परियोजना के पूर्ण होने के बाद चंपारण्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक, विरासत, शिक्षा और वेलनेस पर्यटन की गतिविधियों का भी विस्तार होगा।



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मिलेंगी विश्वस्तरीय सुविधायें
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के सहयोग से प्रदेश के प्रमुख आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर पर्यटन सुविधाओं के विस्तार को और गति मिलेगी। हमारा प्रयास होगा कि महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली की गरिमा और धार्मिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए यहां श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए उच्च गुणवत्तायुक्त सुविधाएं विकसित की जाये। यह परियोजना चंपारण्य को देश के प्रमुख आध्यात्मिक पर्यटन स्थलों के बीच और अधिक प्रभावी रूप से स्थापित करने में सहायक होगी।

छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड प्रदेश के प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और मजबूती से स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहा है। चंपारण्य परियोजना की स्वीकृति छत्तीसगढ़ के आध्यात्मिक पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 


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वैष्णव समाज का प्रमुख तीर्थस्थल है चंपारण
महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चंपारण्य देशभर में वैष्णव श्रद्धालुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल है। प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य चंपारण्य को केवल तीर्थ यात्रा के एक पड़ाव तक सीमित न रखते हुए आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, विरासत एवं अनुभव-आधारित पर्यटन के एक समग्र केंद्र के रूप में विकसित करना है। परियोजना के माध्यम से पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने, उनके ठहराव की अवधि बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने पर फोकस किया जायेगा।







मिलेंगी ये हाइटेक सुविधायें
लगभग 15 एकड़ क्षेत्र में विकसित होने वाली इस परियोजना में महाप्रभु वल्लभाचार्य से संबंधित आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। वल्लभाचार्य स्टैच्यू कॉम्प्लेक्स में म्यूजियम एवं इंटरप्रिटेशन सेंटर, कथा ग्राउंड, ओपन एयर थिएटर, वेलनेस एवं मेडिटेशन सुविधाएं, श्रद्धालुओं के लिए आवास एवं डॉरमेटरी, मल्टीपर्पज हॉल, रेस्टोरेंट और वेंडर शॉप्स जैसी सुविधाएं रहेंगी। 

  • परियोजना में यज्ञ कुंड एवं जल कुंड का उन्नयन, तालाब विकास, दिव्य पाथवे एवं कवर्ड पाथवे, पार्किंग, साइनेज और लैंडस्केपिंग सहित अन्य पर्यटक सुविधाओं का भी विकास प्रस्तावित है। यह श्रद्धालुओं के साथ-साथ परिवारों, सांस्कृतिक पर्यटकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और वेलनेस पर्यटन से जुड़े पर्यटकों के लिए भी आकर्षक अनुभव होगा।
  • इस परियोजना की परिकल्पना इस तरह से की गई है कि चंपारण्य आने वाले श्रद्धालुओं को महाप्रभु वल्लभाचार्य के जीवन, दर्शन और विरासत से परिचित होने का अवसर मिले। सामान्य पर्यटकों के लिए आधे से पूरे दिन तक के प्रवास और धार्मिक आयोजनों एवं वेलनेस गतिविधियों के दौरान अधिक अवधि तक ठहरने की संभावनाओं को भी ध्यान में रखा गया है।



 


क्या है सीएसएमसी?
बता दें कि सीएसएमसी स्वदेश दर्शन 2.0 की केंद्रीय समिति है, जो मिशन निदेशालय की अनुशंसाओं के आधार पर परियोजनाओं की स्वीकृति पर विचार करती है। 

 

महाप्रभु वल्लभाचार्य - फोटो : Amar Ujala Digital
चंपारण में आते हैं देशभर से पुष्टिमार्ग के अनुयायी 
छत्तीसगढ़ में महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चंपारण में देशभर से पुष्टिमार्ग के अनुयायी जुटते हैं। बनारस-दक्षिण प्रवास के दौरान वल्लभाचार्य की माता को प्रसव पीड़ा हुई और चंपारण में चम्पेश्वर महादेव मंदिर के निकट उन्होंने बालक को जन्म दिया। वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग का प्रवर्तन किया और देशभर में कृष्ण भक्ति की अलख जगाई।


कृष्ण भक्ति की अलख जगाई
भारत में हमेशा से उत्तर से दक्षिण भारत की ओर तथा दक्षिण भारत से उत्तर की ओर तीर्थ यात्रा की परंपरा रही है और यह तीर्थ यात्रा महानदी के बहुत से तीर्थ स्थलों के निकट से गुजरती है। चंपारण की कहानी अपने आप में भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है। उसके साथ ही यह महाप्रभु वल्लभाचार्य एवं भक्ति आंदोलन के आचार्यों की सुंदर परंपरा को भी दर्शाती है जिन्होंने सनातन परंपरा के मूल्यों को संजोया और कृष्ण भक्ति की अलख जगाई। महाप्रभु वल्लभाचार्य के अनुयायी पूरे देश में हैं, लेकिन ज्यादातर गुजरात और महाराष्ट्र में है। विदेशों में जाकर बसे लोग भी जो पुष्टि संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं उनका भी चंपारण्यसे नियमित संपर्क रहता है।


महाराष्ट्र-गुजरात में हैं लाखों भक्त
महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य देशभर में हैं। जिन्हें पुष्टि पंथ या वैष्णव संप्रदाय के रूप में जाना जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा श्रद्धालु महाराष्ट्र और गुजरात से दर्शन करने आते हैं। जगद्गुरु की उपाधि प्राप्त महाप्रभु वल्लभाचार्य के देशभर में 84 बैठकें हैं, जहां उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का पारायण किया था। इनमें से प्रमुख बैठक मंदिर चंपारण्य को माना जाता है।



महाप्रभु के बचपन और उनकी सुंदर स्मृतियां दर्ज 
चौरासी वैष्णवों की वार्ता और वल्लभ दिग्विजय जैसे ग्रंथों में महाप्रभु के बचपन और उनकी सुंदर स्मृतियां दर्ज हैं। चंपारण, त्रिवेणी संगम राजिम के निकट है। राजिम में भगवान राजीव  लोचन विराजित हैं। यह पदम क्षेत्र कहा जाता है। इस पद्म क्षेत्र के चारों ओर पंचकोसी परिक्रमा होती है। इस पंचकोसी परिक्रमा में श्रद्धालु हिस्सा लेते हुए चम्पेश्वर महादेव में जल अर्पित करते हैं। 
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मृत समझकर जंगल में छोड़ा, फिर...
करीब 550 साल पहले बनारस से महाप्रभु वल्लभाचार्य के पिता लक्ष्मण भट्ट और माता इल्लमा गारू मुगल शासन में किए जा रहे अत्याचारों से त्रस्त होकर दक्षिण दिशा की ओर पैदल यात्रा पर निकल पड़े। वे छत्तीसगढ़ के राजिम के पास घनघोर जंगल में निर्मित चंपेश्वर धाम से गुजरे, जहां वल्लभाचार्य ने संतान के रूप में जन्म लिया। आठवें माह में ही उनका जन्म हुआ था, इसलिए जन्म के समय उन्होंने कोई हलचल नहीं की। माता-पिता ने उन्हें मृत समझकर और जंगल में ही पत्तों से ढंककर चल दिये। रात में श्रीनाथजी ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तुम्हारी कोख से मैंने जन्म लिया है। सुबह उठते ही वे वापस चंपेश्वर धाम लौटे, तो देखा कि बालक अग्नि कुंड में अंगूठा चूस रहा है। अग्नि कुंड के चारों ओर औघड़ बाबा भी बैठे थे। औघड़ बाबाओं को यकीन नहीं हुआ कि बालक उस दंपती का पुत्र है। इस पर माता ने श्रीनाथजी को याद किया और श्रीनाथजी ने दर्शन देकर औघड़ बाबाओं की शंका दूर की।



राजधानी रायपुर से 50 किमी दूर है प्राकट्य स्थली
महाप्रभु वल्लभाचार्य की प्राकट्य स्थली चंपारण्य रायपुर रेलवे स्टेशन से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां जाने के लिए भांठागांव बस स्टैंड से बस, जीप, कार आदि वाहन हर आधे घंटे में आसानी से मिल जाते हैं। रायपुर से 25 किलोमीटर अभनपुर और फिर 20 किलोमीटर राजिम और राजिम से मात्र पांच किलोमीटर दूर चंपारण्य है।


 
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