छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम में संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका हाइकोर्ट ने खारिज कर दी है। सुनवाई के दौरान शासन की ओर से बताया गया कि विधेयक पर अभी बजट सत्र में चर्चा होनी है, इसलिए याचिका को अयोग्य करार दिया है।
चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा की डीबी में सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन भारत ने शासन का पक्ष रखते हुए कहा कि इस मामले में नया अध्यादेश जारी होगा। सरकार द्वारा बजट सत्र में इसे विधानसभा पटल में रखा जाएगा। इसलिए याचिका औचित्यहीन है। डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मेरिट बेस पर याचिका को खारिज कर दिया।
गौरतलब है कि जिला पंचायत सूरजपुर के उपाध्यक्ष नरेश रजवाड़े ने हाईकोर्ट में याचिका लगाकर कहा था कि पांचवी अनुसूची में शामिल जिलों में ओबीसी वर्ग को आरक्षण प्रदान करने वाली छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 129 (ड.) की उपधारा (03) को लोप करने के लिए पिछले साल 3 दिसंबर को राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ पंचायत राज (संशोधन) अध्यादेश- 2024 लाया है। संविधान के अनुच्छेद 213 में निहित प्रावधान के तहत कोई भी अध्यादेश अधिकतम छह माह की अवधि तक ही क्रियाशील होता है अथवा विधानसभा के आगामी सत्र में अनिवार्य रूप से प्रस्ताव पारित कर अधिनियम का रूप दिलाना होता है, जिसमें छत्तीसगढ़ शासन ने गंभीर चूक की है। अध्यादेश जारी होने के बाद इस महत्वपूर्ण अध्यादेश को पारित नहीं कराते हुए मात्र विधानसभा के पटल पर रखा गया है। इस कारण अध्यादेश वर्तमान में विधिशून्य और औचित्यविहीन है। ऐसी स्थिति में वर्तमान में उक्त संशोधन के आधार पर छत्तीसगढ़ पंचायत निर्वाचन नियम (5) में दिनांक 24 दिसंबर 2024 को किया गया संशोधन पूर्णतः अवैधानिक है।