34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की कस्टडी में मौत के मामले में बिलासपुर में CBI की एंट्री हो गई है। CBI की तीन सदस्यीय टीम आज सेंट्रल जेल पहुंची और मामले में जांच शुरू कर दी है। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को मृतक के परिवार को अंतरिम मुआवजे के रूप में ₹25 लाख देने का निर्देश दिया था।
हिरासत में मौत की परिस्थितियों की होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जांच में हिरासत में हिंसा के लिए जो भी अधिकारी जिम्मेदार पाए जाएं, उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए। CBI को युवक की मौत की परिस्थितियों के साथ यह भी जांचने का निर्देश दिया गया है कि न्यायिक जांच में सिर पर चोट की बात सामने आने के बावजूद राज्य के अधिकारियों ने समय पर उचित कार्रवाई क्यों नहीं की।
शराब रखने के आरोप में हिरासत में लिया गया था
मामला बिलासपुर जिले के सीपत थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने 18 जनवरी 2024 को श्रवण सूर्यवंशी को कच्ची महुआ शराब रखने के आरोप में हिरासत में लिया था। इसके तीन दिन बाद 21 जनवरी को अस्पताल में उसकी मौत हो गई। आरोप था कि श्रवण ने अपनी किराना दुकान के सामने करीब 1,200 रुपये की शराब बिक्री के लिए रखी थी।
न्यायिक जांच में सिर पर चोट का खुलासा
श्रवण की मौत के बाद जेल अधीक्षक ने 22 जनवरी 2024 को सेशन जज को पत्र लिखकर न्यायिक जांच की मांग की थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने जांच की और जुलाई 2024 में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में बताया गया कि मौत सिर पर किसी blunt weapon से लगी चोट के बाद उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई।
हाईकोर्ट में परिवार ने मांगा था 50 लाख मुआवजा
मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने निष्पक्ष जांच और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग को लेकर अपने अधिवक्ता राजीव दुबे के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने परिवार को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन FIR दर्ज करने या स्वतंत्र जांच का निर्देश नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे को माना बेहद कम
इसके बाद परिवार ने अधिवक्ता राजीव दुबे के माध्यम से विधिक सहायता लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक लाख रुपये के मुआवजे को मामले की गंभीरता की तुलना में बेहद कम माना। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को अब परिवार को 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
FIR में ढाई साल की देरी पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि श्रवण की मौत के करीब ढाई साल बाद 30 जुलाई 2026 को FIR दर्ज की गई। FIR में देरी को लेकर कोर्ट ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने CBI को नियमित आपराधिक केस दर्ज कर जांच करने और किसी वरिष्ठ अधिकारी को इसकी जिम्मेदारी सौंपने का निर्देश दिया।
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DGP की दलील पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
पिछली सुनवाई के दौरान DGP की ओर से FIR में देरी का कारण बताते हुए कहा गया था कि न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को नहीं मिली थी। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि रिपोर्ट राज्य की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के साथ पहले ही पेश की जा चुकी थी। DGP की ओर से यह भी कहा गया था कि रिपोर्ट में कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और निष्पक्ष जांच के लिए CBI को जिम्मेदारी सौंप दी।
अब तय होगा हिरासत में हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार
CBI की जांच में यह तय किया जाएगा कि श्रवण की मौत की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, हिरासत में उसके साथ हिंसा हुई थी या नहीं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इसके साथ ही न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कार्रवाई में देरी के कारणों की भी पड़ताल होगी। अब निगाहें CBI की जांच और उसके निष्कर्षों पर टिकी हैं।