बीजापुर जिले में आदिवासी बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू किए गए पोटाकेबिन आश्रम आज खुद असंवेदनशील व्यवस्था और कमजोर प्रबंधन की जकड़ में फंसे हुए हैं। करीब 15,000 बच्चे ऐसे आश्रमों में रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों की भारी कमी, स्थायी शिक्षकों का अभाव और कमजोर निगरानी व्यवस्था के कारण इन बच्चों का भविष्य खतरे में है।
बड़े इरादे, छोटी व्यवस्थाएं
राज्य सरकार की समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत स्थापित 34 प्राथमिक और 26 माध्यमिक पोटाकेबिनों का उद्देश्य दूरस्थ और नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा की रोशनी पहुँचाना था। परंतु इस नेक मंशा को ज़मीनी हकीकत में बदलने के लिए जिन बुनियादी ढांचों की आवश्यकता थी, वे आज भी अधूरी हैं।
किसी भी आश्रम में नियमित शिक्षक नियुक्त नहीं किए गए हैं। 12वीं पास या उससे कम योग्यता वाले 491 अनुदेशक बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ये अनुदेशक मात्र 10,000 से 12,000 मानदेय पर चौबीसों घंटे सेवाएं दे रहे हैं। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों की देखभाल, भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण दायित्व भी इन्हीं अनुदेशकों के कंधों पर हैं। यह स्थिति न सिर्फ बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए हानिकारक है, बल्कि उनके समग्र जीवन विकास को भी प्रभावित कर रही है।
भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी, जवाबदेही ज़रूरी
राशन आपूर्ति, भवन रखरखाव, बच्चों की आवश्यकताओं आदि में हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। लेकिन ये खर्च बच्चों की सुविधा में परिलक्षित नहीं होते। जिला स्तर पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की शिकायतें आम हो चुकी हैं। हाल ही में समग्र शिक्षा से जुड़े कर्मी को निलंबित किया गया, जो इस बात का संकेत है कि सुधार की शुरुआत हो सकती है। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो।
समाधान क्या हो सकते हैं?
नियमित शिक्षकों की भर्ती पोटाकेबिनों में स्थायी, प्रशिक्षित शिक्षकों की तत्काल नियुक्ति ज़रूरी है। प्रशिक्षण और क्षमता विकास वर्तमान अनुदेशकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है। स्वतंत्र निगरानी तंत्र भ्रष्टाचार रोकने के लिए स्वतंत्र जांच और ऑडिट एजेंसियों को जोड़ा जाए। स्थानीय भागीदारी ग्राम पंचायतों, महिला समूहों और स्थानीय संगठनों को निगरानी में शामिल किया जाए।
एक अवसर है बदलाव का
पोटाकेबिन सिर्फ एक योजना नहीं, एक सपना है। उन बच्चों का सपना जो अपने जंगलों से निकलकर एक बेहतर कल की ओर देख रहे हैं। इस व्यवस्था को दुरुस्त कर उनके सपनों को साकार करना सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्तरदायित्व है।